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Karam Sanyasi Krishna

by Jhunni Lal Verma , Ed. Satya Mohan Verma
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788180319570
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Lokbharti Prakashan
  • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 304
  • Original Price: INR 995.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 484 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

व्यासदेव प्रणीत ‘महाभारत’ ग्रन्थ में भारत के राष्ट्रीय युग-परिवर्तन का इतिहास है। वह उस दीप-स्तम्भ के समान है, जिसके प्रकाश में अतीत की चित्रावली के साथ-साथ युग-क्रान्ति के पश्चात् स्थापित होनेवाली नवीन राजसत्ता, समाज और व्यक्ति के नवीन रूप, नवीन उत्साह और नवीन आकांक्षाओं की भी झलक प्राप्त होती है। यद्यपि उस ग्रन्थ में कौरव-पांडवों के भीषण युद्ध का वर्णन है, परन्तु रचना के मूल नायक कृष्ण हैं।

कृष्ण के जिन स्वरूपों का उक्त ग्रन्थ में उद्घाटन हुआ है, उनमें युग-पुरुष, विभूति, तत्त्वज्ञ तथा पूर्णावतार मुख्य हैं। यदि कृष्ण के अवतार रूप को वादग्रस्त भी मान लिया जाए तब भी उनके शेष तीन रूप ही उन्हें मानवेतर या महामानव के पद पर आसीन करने को पर्याप्त हैं। उनका चरित्र इतना विशाल और गूढ़ है कि उसका पूर्ण दर्शन सम्भव नहीं। मानवीय जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं जो उनके क्रियात्मक रूप से अछूता बचा हो। प्रथम रूप में वे अपने युग के नरोत्तम, दूसरे में महामानव और तीसरे में जगद्गुरु हैं। इन सब कारणों से वे पूर्ण पुरुष कहे व माने जाते हैं। योगेश्वर कृष्ण ने जिस अध्यात्म की चर्चा की तथा जिस स्थिति को प्राप्त करना प्रगतिशील मानवी जीवन की सबसे उत्कृष्ट उपलब्धि बतलाई है, वह इस जीवन से विलग किसी अन्य क्षेत्र की गतिविधि नहीं। यथार्थ में गीता-प्रतिपादित अध्यात्म मानवी-जीवन का ही विषय है और उसी का अंग है। वह संसार के व्यवहार से सम्बन्धित है। वह व्यक्तिगत व सामाजिक व्यवहार शुद्धि पर अवलम्बित है। आसुरी वृत्ति का त्याग और सात्त्विकता का अर्जन उस मार्ग के दिशा-सूचक संकेत-चिन्ह हैं।

यह पुस्तक पश्चिम के प्रभावस्वरूप भारत में कृष्ण को लेकर प्रचलित उन धारणाओं का खंडन करती है

जो कृष्ण की ऐतिहासिकता और गुण-सम्पन्नता को क्षतिग्रस्त करने का प्रयास करती है। कृष्ण के सन्दर्भ में प्रक्षेपित संशयों का निराकरण करते हुए विद्वान लेखक इस पुस्तक में कृष्ण की नितान्त आधुनिक और समीचीन व्याख्या प्रस्तुत करते हैं और अकाट्य तथा प्रखर तर्कों के आधार पर एक सम्पूर्ण कृष्ण-छवि की रचना करते हैं।

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