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Khadya Sankat Ki Chunauti

by Mahasweta Devi , Arun Kumar Tripathi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350000649
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 188
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 350 grams
  • BISAC Subject(s): Economics / General

खाद्य संकट की चुनौती - पैसा, पॉवर और सेक्स की असाधारण भूख के इस दौर में दुनिया की एक अरब से ज़्यादा आबादी भूखे पेट सोती है। यह हमारे दौर की बड़ी विडम्बना है। बल्कि इसे दुनिया का नया आश्चर्य कहें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। पर यह विडम्बना कोई संयोग नहीं है। यह उत्पन्न इसीलिए हुई क्योंकि कुछ लोगों की ग़ैरज़रूरी भूख बढ़ गयी है और उन्होंने ज़रूरी भूख पर ध्यान देना छोड़ दिया है। इस क्रूर खाद्य प्रणाली ने अमीरों को भी तरह-तरह की बीमारियाँ दी हैं और धरती के पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचायी है। यह क्षति बढ़ती गयी तो धरती सबका पेट भर पाने से इन्कार भी कर सकती है। खाद्य संकट की यह चुनौती हमें नये विकल्पों की तलाश के लिए ललकारती है।अन्तिम पृष्ठ आवरण - भूमंडलीकरण और उदारीकरण की जनविरोधी नीतियाँ संकट में है। अमेरिका और यूरोप से लेकर चीन और भारत समेत पूरी दुनिया में इसका असर पड़ा है। पूँजी के दिग्विजयी अभियान पर ब्रेक लगा है तो लाखों लोगों की नौकरियाँ भी गयी है। उदारीकरण के समर्थक इसे कम करके दिखा रहे हैं और महज वित्तीय पूँजी का संकट बता रहे हैं, जबकि यह वास्तविक अर्थव्यवस्था का संकट है और पिछले ढाई दशक से चल रही आर्थिक नीतियों का परिणाम है। इसके कई आयाम हैं और उन्हीं में एक गम्भीर आयाम है खाद्य संकट। खाद्य संकट की जड़ें कृषि संकट में भी हैं और उस आधुनिक खाद्य प्रणाली में भी जिसे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने मनुष्य और धरती के स्वास्थ्य की क़ीमत पर अपने हितों के लिए तैयार किया है। एक तरफ़ दुनिया के कई देशों में अनाज के लिए दंगे हो रहे हैं और दूसरी तरफ़ उच्च ऊर्जा के गरिष्ठ भोजन के चलते मोटापा, डायबटीज़, हृदय रोग जैसी तमाम बीमारियों ने लोगों को घेर रखा है। सुख-समृद्धि देने का दावा करने वाला पूँजीवाद सामान्य आदमी का पेट काट रहा है तो अमीर आदमी के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहा है। अर्थशास्त्री, जनस्वास्थ्य वैज्ञानिक, योजनाकार, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, समीक्षक और साहित्यकार जैसे विविध बौद्धिकों की टिप्पणियों, विश्लेषणों और वर्णनों के माध्यम से यह संकलन खाद्य संकट को समझने का प्रयास है। पुस्तक के विभिन्न लेखक इस संकट के वैश्विक स्वरूप में भारत की स्थिति स्पष्ट करते हैं और साथ ही विश्व भर में विकल्प ढूँढ़ने के प्रयासों का ज़िक्र करते हुए यह हौसला देते हैं कि दुनिया विकल्पहीन नहीं है।

महाश्वेता देवी -बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और पश्चिम बंगाल के घने क़बायली इलाक़ों में रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है। यही उनका विशिष्ट क्षेत्र भी बना और यहीं चल रहे शोषण के विरुद्ध उन्होंने बार-बार आवाज़ बुलन्द की। उपन्यास, कहानी, नाटक, बाल साहित्य की कोई 175 पुस्तकें प्रकाशित पद्मश्री, साहित्य अकादेमी, मैग्सेसे, ज्ञानपीठ आदि पुरस्कारों से सम्मानित।अरुण कुमार त्रिपाठी - 9 अक्टूबर, 1961 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के एक किसान परिवार में जन्म। लखनऊ विश्वविद्यालय में एलएल.एम. की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता मानवाधिकार, दलित, स्त्री, पर्यावरण और आदिवासी आन्दोलनों से गहरा नाता। 'जनसत्ता' और 'द इंडियन एक्सप्रेस' से शुरू कर, आजकल 'हिन्दुस्तान' (दिल्ली) में संयुक्त सम्पादक। वाणी प्रकाशन की 'आज के प्रश्न श्रृंखला में नियमित लेखन। प्रकाशित कृतियाँ- 'कल्याण सिंह', 'मेघा पाटकर' और 'कट्टरता के दौर में'। '1857' पर नयी पुस्तक की तैयारी में।

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