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Khud Se Milne Ki Fursat Kise Thi

by Parveen Shakir
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789390678129
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 144
  • Original Price: INR 225.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): General

‘तू मिरी सोच भी, तस्वीर भी और बोली भी मैं तिरी माँ भी, तिरी दोस्त भी हमजोली भी‘समाजी और सियासी ताक़तों ने बड़े पैमाने पर हमारे नज़रिये और उस तहरीक को एक शक्ल दी है जिसे आज हमने फेमिनिज़्म या हुकूक-ए-निस्वा का नाम दिया है। भले ही परिभाषाएँ अलग-अलग हों, लेकिन ज़्यादातर लोग इस बात से इत्तिफाक करते होंगे कि ये तहरीक मर्द और औरत में समानता की बात करती है। मुआशरें' में चली आ रही एक सदियों पुरानी ग़लत रिवायत की दुरुस्ती जिसमें औरतों को या जिन्हें सिमोन द बोउवा (Simone De Beauvoir) ने द सेकेंड सेक्स या नज़रअन्दाज़ औरतें कहा है, कमतर समझा गया है जो मर्दों के निस्बत परिभाषित की जा रही औरतों के खिलाफ सरासर नाइंसाफी है। बोउवा के 'द सेकेंड सेक्स' के बाद के सत्तर सालों के दौरान, लिंग और लैंगिकता ने कई बहस-मुबाहिसों को जन्म दिया है और मर्द तथा औरत के बीच की बराबरी आज भी बहस का मरकज़ बनी हुई है।- पेश लफ़्ज़ से

परवीन शाकिर (1952-1994) पाकिस्तानी कवि, शिक्षक और पाकिस्तान सरकार में प्रशासनिक सेवक थीं। उन्होंने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था। उन्होंने गद्य और कविता दोनों लिखे, उर्दू अख़बारों में उनके कॉलम और अंग्रेज़ी दैनिक समाचार-पत्रों में उनके कुछ लेख भी छपते रहे। शुरुआती दौर में वे क़लम-नाम 'बीना' के तहत लिखती थीं। वे अपनी कविताओं के लिए लोकप्रिय हैं, और उर्दू साहित्य में एक विशिष्ट स्त्री-स्वर के रूप में पहचानी गयीं। उर्दू साहित्य में स्त्री-स्वर को बुलन्द करने में उनका विशेष योगदान रहा। माह-ए-तमाम नामक संग्रह में संगृहीत उनकी रचनाएँ कम उम्र जीवन में उनकी काव्य यात्रा की व्यापकता से हमारा परिचय कराती हैं। उनकी किताबें ‘खुशबू’, ‘सदबर्ग’, ‘ख़ुद- कलामी’, ‘इंकार’, और ‘क़ाफ-ए-आईना’ (डायरी जिसे मरणोपरान्त जारी किया गया) और गद्य ‘गोशा-ए-चश्म’, उनके समाचार-पत्रों में प्रकाशित आलेखों का संकलन है। साहित्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान ‘प्राइड ऑफ़ परफॉर्मेंस’ से सम्मानित किया गया। उनकी मृत्यु के बाद हर साल इस्लामाबाद में बने उनके स्मारक पर परवीन शाकिर उर्दू साहित्य महोत्सव आयोजित किया जाता है।★★★रख़्शंदा जलील लेखक, अनुवादक, आलोचक और साहित्यिक इतिहासकार हैं। इनके अनेक अनुवाद संकलन, बौद्धिक आलेख व पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इन्होंने 'प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट एज़ रिफ्लेक्टेड इन उर्दू पर पीएच.डी. की है जिसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया है।स्त्रीवादी लेखिका डॉ. रशीद जहाँ की आत्मकथा, प्रेमचन्द, फणीश्वरनाथ 'रेणु', शहरयार, कृश्न चन्दर और इन्तिज़ार हुसैन की लघुकथाओं, शायरी और उपन्यासों का अनुवाद किया है। इनका निबन्ध संग्रह 'इनविज़िबल सिटी' जोकि दिल्ली के प्रसिद्ध स्मारकों पर आधारित है, पाठकों द्वारा पसन्द किया गया है।आप 2002 से 'हिन्दुस्तानी आवाज़' संस्था चला रही हैं, जो हिन्दी-उर्दू साहित्य एवं संस्कृति को लोकप्रिय बनाने के लिए समर्पित है।

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