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Kuchh Rang The Khwabon Ke

by Nasera Sharma
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789357751797
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 160
  • Original Price: INR 325.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): Literary

कुछ रंग थे ख़्वाबों के प्रेम का एक नया पृष्ठभूमि पर रचा गया अनूठा उपन्यास है। यह काल भीतर घटित केवल अपने काल की नहीं, बल्कि उसे लाँघ उस प्रेम की गाथा बन जाता है जिसके बारे में कभी महान दार्शनिक अरस्तू ने कहा था-यह (प्रेम) भले ही जनमता एक ही आत्मा से, लेकिन करता निवास दो देहों में।इस उपन्यास के मुख्य पात्र सुरभि और सायरस ऐसे ही प्रेम के प्रतीक हैं। वे प्रतीक इस बात के भी हैं कि उनका प्रेम अपनी दार्शनिकता में निज तक न रहकर सम्पूर्ण विश्व-समाज की समस्याओं को भी अपने में समाहित कर लेता है जिसे दोनों अपनी-अपनी तरह से सुलझाने की कोशिश में एक जान दो क़ालिब बन जाते हैं। दरअसल सुरभि और सायरस के प्रेम की धुरी वह सरोकार है जो उनके समय के जटिल लेकिन ज़रूरी प्रश्नों से उपजा है।यह उपन्यास ईरान-इराक युद्ध, ईरानी धरती पर अमेरिकन आर्थिक नाकाबन्दी और वहाँ इस्लामिक गणतन्त्र की स्थापना के बाद के समय को पूरी गहराई के साथ उठाता है जिससे पिछली शताब्दी के अन्तिम दशक के वो हालात उभरकर सामने आते हैं, जिनमें घिरे वहाँ के नागरिक अपने जीवन का कष्टमय दिन गुज़ार रहे थे। और उसी भयानक दौर का एक मुकम्मल बयान अल्ज़ाइमर की बीमारी से पीड़ित सायरस है जिसका दर्द न केवल उसका, बल्कि सुरभि का भी बन जाता है।देखा जाये तो इस कृति में ईरान और हिन्द के ऐतिहासिक रिश्ते की एक धारा जो सुरभि और सायरस के रूप में बहती है, वह किसी भी सरहद से इतर है। इसलिए इसमें उस हर देश की सुरभि और सायरस की कथा है, जहाँ सत्ता और शासन के लिए जंग को अनिवार्य समझा जाता है, मनुष्यों की मुक्ति टूटे पंख की तरह बिखर के रह जाती है और सपनों के रिश्ते बारूद से सनी मिट्टी में दफ़्न हो जाते हैं।यह उपन्यास अपने कथ्य के कारण ही नहीं, अपनी भाषा के कारण भी इस मायने में उल्लेखनीय है कि इसमें हिन्दी, अरबी और पर्शियन शब्दों के सहमेल से रचे गये संवाद अपने ख़ास अन्दाज़ और आस्वाद में जिस तरह सहज ही आकर्षित करते हैं, हम उसी तरह स्वतः उनके पाश में बँधे रह जाते हैं। इसका शिल्प भी गद्य की तरह कम अपने संवेद-रचाव में काव्य की तरह ज्यादा है। निस्सन्देह, हिन्दी साहित्य-जगत् के लिए एक दुर्लभ हासिल की तरह है कुछ रंग थे ख़्वाबों के।

नासिरा शर्मा का जन्म सन् 1948 में इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने फ़ारसी भाषा साहित्य में एम.ए. किया। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी, पश्तो एवं फारसी पर उनकी गहरी पकड़ है। वह ईरानी समाज और राजनीति के अतिरिक्त साहित्य, कला व संस्कृति विषयों की विशेषज्ञ हैं। इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान व भारत के राजनीतिज्ञों तथा प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों के साथ उन्होंने साक्षात्कार किये, जो बहुचर्चित हुए। ईरानी युद्धबन्दियों पर जर्मन व फ्रांसीसी दूरदर्शन के लिए बनी फ़िल्म में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। सर्जनात्मक लेखन में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के साथ ही स्वतन्त्र पत्रकारिता में भी उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है।प्रकाशन : उपन्यास : सात नदियाँ एक समन्दर, शाल्मली, ठीकरे की मँगनी, ज़िन्दा मुहावरे, कुइयाँ-जान, ज़ीरो रोड, अक्षयवट, अजनबी ज़जीरा, पारिजात, काग़ज़ की नाव, शब्द पखेरू, दूसरी जन्नत, अल्फ़ा-बीटा-गामा; कहानी-संग्रह : शामी काग़ज़, पत्थर गली, संगसार, इब्ने मरियम, सबीना के चालीस चोर, ख़ुदा की वापसी, बुतख़ाना, दूसरा ताजमहल, इन्सानी नस्ल; सम्पूर्ण अध्ययन अफ़ग़ानिस्तान : बुज़कशी का मैदान, (दो खण्डों में) मरजीना का देश इराक़; लेख-संग्रह: राष्ट्र और मुसलमान, औरत के लिए औरत, औरत की दुनिया, वो एक कुमारबाज़ थी, औरत की आवाज़; रिपोर्ताज : जहाँ फ़व्वारे लहू रोते हैं; संस्मरण : यादों के गलियारे; अनुवाद : शाहनामा-ए-फ़िरदौसी, गुलिस्तान-ए-सादी, क़िस्सा जाम का, काली छोटी मछली, पोयम ऑफ़ प्रोटेस्ट, बर्निंग पायर, अदब में बायीं पसली (छह खण्डों में ); आलोचना : किताब के बहाने, सबसे पुराना दरख़्त; विविध: जब समय बदल रहा हो इतिहास; बाल-साहित्य : भूतों का मैकडोनल, दिल्लू दीमक, बदलू और उसकी मित्रमण्डली (उपन्यास) । गुल्लू, गिल्लो बी, दर्द का रिश्ता, चितकबरी (कहानी-संग्रह); नवसाक्षरों के लिए : धन्यवाद, पढ़ने का हक़, सच्ची सहेली, एक थी सुल्ताना, टी. वी. फ़िल्म व सीरियल : 'तड़प', 'माँ', 'काली मोहिनी', 'आया बसन्त सखी', 'सेमल का दरख़्त' (टेलीफ़िल्म), 'शाल्मली', 'दो बहनें', 'वापसी' (सीरियल)।सम्पर्क : डी-37/754, छत्तरपुर हिल्स, नयी दिल्ली-74 ।

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