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Laut Aayangi Aankhen

by Ram Kumar Krishak
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170558033
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 136
  • Original Price: INR 125.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

लौट आएँगी आँखें - रामकुमार कृषक का कवि प्रकृति और अपने समय से संवाद करते हुए इतिहास और उसकी रूढ़ अवधारणाओं को कठघरे में खड़ा करता वह न तो समकालीन विडम्बनाओं से भागना जानता है और न उन्हें व्यक्त करने को उतावला रहता है। वह अपनी आँखों देखी कठोर और क्रूर सच्चाइयों का धैर्यवान कवि है- “सूखे गन्ने की तरह खड़ा है भागसिंह!" यह उसका ग्रामीण यथार्थ है और- "हर सुबह अपदस्थ हुआ मैं/चाय के साथ उबलना शुरू कर देता हूँ" उसका शहरी यथार्थ।साझा संस्कृति का कवि न गीत-संवेदना को नकारता है, न आधुनिक त्रासदी से मुँह मोड़ता है। कृषक का कवि ऐसा ही कवि है। शहर और गाँव के बीच उसकी कविता में जो खण्डित बिम्ब बिखरे नज़र आते हैं, वही आज के इन्सान की सच्चाई है। उसकी चाहत और प्रश्न भी इसी में निहित हैं। आधुनिक बोध के संग-साथ चलते हुए कृषक की काव्य-संवदेना क्रान्ति के सवाल को लगातार अपने सामने रखती है।हमारे आज के ज़्यादातर कवि जहाँ समकालीन ज़िन्दगी पर सपाटबयानी कर रहे हैं और धीरे-धीरे कविता से ही विरत होते जा रहे हैं, वहीं कृषक का कवि टॉपिकल पोयम लिखनेवाले शहरी कवियों के मुकाबले मर्मस्पर्शी जीवन-यथार्थ और उसके सहज स्वीकार का कवि है- “ख़ाली घर, ख़ाली जेब और खाली वक़्त/भरी धरती का छटपटाना " इसी त्रासदीय छटपटाहट ने कृषक के कवि की गहरी और आत्मीय कुव्वत का कवि बना दिया है।मेरे लिए सर्वेश्वर , गोरख, मानबहादुर और पाश की 'दुःसह अनुभूति' के सार्थक कवि हैं कृषक। सम्भव है एक और कवि महेश्वर की तरह आज के सवालों का उत्तर खोजते हुए गुज़र जाये। सम्भव है पीढ़ियों के प्रश्न' विश्वमंडी के दलालों, संस्कृति के बिचौलियों और मस्जिद तोड़नेवालों से कभी अपना जवाब माँगें। संकट के इस दौर में कृषक की कविता वास्तव में एक पोस्टर कविता है। इस मानी में ये नागार्जुन के निकटवर्ती राजनीतिक सत्य के कवि हैं। बच्चे और उनकी आँखें इन कविताओं में देश का भविष्य है, और "पुराना होते जाने के साथ साथ/नया होते जाने की" कवि की अपनी चाह भी मुझे बार-बार रोमांचित करती है। -विष्णुचंद्र शर्मा

रामकुमार कृषक - जन्म : 1 अक्टूबर, 1943 ई.।जन्मस्थान : अमरोहा के पास मुरादाबाद जनपद का गाँव गुलड़िया। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव और अमरोहा में। बरसों बाद मेरठ विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.। साहित्यरत्न।जीविकोपार्जन के लिए दिल्ली में रहकर सन् 1965 से पत्रकारिता। कभी-कभी अध्यापन। लेखन और सम्पादन में आज तक संलग्न। विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों में सक्रिय हिस्सेदारी। जन संस्कृति मंच की दिल्ली इकाई के संस्थापक सदस्य और उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रहे। राष्ट्रीय लघु पत्रिका समन्वय समिति की केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य।प्रकाशवीर शास्त्री स्मृति पुरस्कार (1983), हिन्दी अकादमी, दिल्ली (1991) और सारस्वत सम्मान (1997, मुम्बई) से पुरस्कृत-सम्मानित। अनेक महत्त्वपूर्ण संपादित संग्रहों और पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। 1989 से जनोन्मुख साहित्य की अनियतकालीन पत्रिका 'अलाव' का सम्पादन। केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद से 'रामकुमार कृषक: गीतों और ग़ज़लों में सामाजिक सन्दर्भ' शीर्षक से जड़ा उषारानी द्वारा लिखित और डॉ. सुवासकुमार द्वारा निर्देशित शोध-कार्य सम्पन्न और प्रकाशित।प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें : बापू (1969), ज्योति (1972), सुर्खियों के स्याह चेहरे (1977), नीम की पत्तियाँ (1984), फिर वही आकाश (1991), आदमी के नाम पर मज़हब नहीं (1992), मैं हूँ हिन्दुस्तान (1998) तथा लौट आएँगी आँखें (2002) - सभी कविता संग्रह। सबसे सुंदर हाथ, पंख मिलें पंछी हो जाएँ, हमारी माँ तुम्हारी माँ, घीसू और माधी, टीपू की माँ, परहित सरिस धरम नहिं भाई, शहीद की शुरुआत-नवसाक्षरों के लिए, तथा नमक की डलियाँ (कहानी-संग्रह)।

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