Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Laut Kar Aana Nahin Hoga

by Kantikumar Jain
Save 35% Save 35%
Current price ₹390.00
Original price ₹599.00
Original price ₹599.00
Original price ₹599.00
(-35%)
₹390.00
Current price ₹390.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170559375
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 262
  • Original Price: INR 599.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 490 grams
  • BISAC Subject(s): Memoirs

“हिन्दी में संस्मरणों को गम्भीरता से नहीं लिया जाता । संस्मरण हिन्दी की ओ.बी. सी. विधा मानी जाती है। उसे उस लेखक का लेखन माना जाता है जो चुक गया है, जो अपने अतीत को गरिमा मंडित करना चाहता है, जो दूसरों से अपनी लगी का हिसाब चुकाना चाहता है और जो संस्मरणों की गेंडी पर चढ़कर दूसरों से कुछ ज्यादा आदमकद दिखाना चाहता है। हिन्दी में एक शब्द बड़ा प्रचलित है-प्रातः स्मरणीय। प्रातः स्मरणीयों की बुराइयाँ, उनकी कमियाँ, उनके ऐब देखने या दिखाने का रिवाज़ हमारे यहाँ नहीं है। और जो जीवित हैं, उन पर संस्मरण लिखना व्यावहारिक नहीं माना जाता। इसलिए मरे हुओं के बारे में, जीवितों के बारे में सच बोलने की हमारे यहाँ सख़्त मुमानियत है। 'सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यमप्रियम्' के सुभाषित का संस्मरण लेखन में बड़े नेम धरम से पालन किया जाता है। मैंने अपने संस्मरणों में इस सुभाषित का रौब नहीं माना। जीवितों को भी याद किया, और दिवंगतों को भी। जीवितों को इसलिए कि यदि मैं झूठ बोल रहा होऊँ तो कोई भी काला कौआ मुझे काट ले। दिवंगत तो खैर न कुछ सुनते हैं, न कुछ पढ़ते हैं। इन संस्मरणों ने मेरे कुछ मित्रों को भूतपूर्व की श्रेणी में डाल दिया है। कुछ को इन संस्मरणों में मेरी भावभंगी मेरा भंगीभाव लगा है। भंगीभाव से मैं इनकार नहीं करूँगा।"इसी पुस्तक की भूमिका से

कान्तिकुमार जैन - नौ सितम्बर, 1932 को सागर (म.प्र.) के देवरीकलां में जन्मे कान्तिकुमार जैन ने कोरिया (छत्तीसगढ़) के बैकुंठपुर से 1948 में मैट्रिक करने के बाद उच्च शिक्षा सागर विश्वविद्यालय में प्राप्त की। मैट्रिक में हिन्दी में विशेष योग्यता के लिए उन्हें कोरिया दरबार स्वर्णपदक से नवाज़ा गया। विश्वविद्यालय की सभी परीक्षाओं में उन्होंने प्रथम श्रेणी, प्रथम स्थान व स्वर्णपदक हासिल किये। 1956 से मध्य प्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षणोपरान्त सन् 1978 से 1992 तक डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में माखनलाल चतुर्वेदी पीठ पर हिन्दी प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे।कान्तिकुमार जी ने 'छत्तीसगढ़ की जनपदीय शब्दावली' पर शोध किया। उनकी पुस्तकों- छत्तीसगढ़ बोली: व्याकरण और कोश, नयी कविता, भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य, कबीरदास, इक्कीसवीं शताब्दी की हिन्दी, छायावाद की मैदानी और पहाड़ी शैलियाँ ने खूब चर्चा बटोरी। सागर विश्वविद्यालय की 'बुन्देली पीठ' की ओर से प्रकाशित बुन्देली लोकसंस्कृति की पत्रिका 'ईसुरी' के ख्यात सम्पादक रहे कान्तिकुमार जी ने इस पत्रिका की ख्याति को अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया।कान्तिकुमार जी पिछले एक दशक से संस्मरण लेखन में सक्रिय हैं। सन् 2002 में प्रकाशित उनकी संस्मरणों की पहली पुस्तक लौट कर आना नहीं होगा से ही संस्मरण विधा में बेहद चर्चित होने के उपरान्त 2004 में तुम्हारा परसाई, 2006 में जो कहूँगा सच कहूँगा, 2007 में अब तो बात फैल गयी, 2011 में बैकुण्ठपुर में बचपन, 2014 में महागुरु मुक्तिबोध : जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर, 2015 में एक था राजा, 2017 में लौट जाती है उधर को भी नज़र नामक आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आठवीं पुस्तक लौट जाती है उधर को भी नज़र में पप्पू खवास का कुनबा नामक उनके संस्मरणों की चर्चित श्रृंखला भी संकलित है।

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us