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Mahadevi Sanchayita

by Mahadevi Verma
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170551966
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 434
  • Original Price: INR 875.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 800 grams
  • BISAC Subject(s): Hinduism / Sacred Writings

महादेवी वर्मा संचयिता - महादेवी वर्मा की प्रगतिशीलता केवल स्त्री सम्बन्धी प्रश्नों तक ही सीमित नहीं थी। उन्होंने इसके अलावा भी तमाम सामयिक प्रश्नों की विस्तार से विवेचना कर हमारे वर्तमान समय के बारे में भी सोचने की मजबूरी पैदा की। पिछड़े वर्गों से आने वाले शिक्षार्थियों की समस्या आज़ादी के पचपन वर्ष बाद भी पूरी तरह सुलझी नहीं है।महादेवी के ऐसे तमाम लेखों का बहुत बड़ा आकर्षण रचनाकार का साहसी व्यक्तित्व है। उन्होंने न जीवन में भय माना न लेखन में उनकी निडर बनावट ने ही उन्हें ज़रूरत पड़ने पर औरों के साथ ख़ुद अपने ख़िलाफ़ खड़े होने की क्षमता दी। परिवार, धर्म, परम्परा, समाज, राजसत्ता किसी का वर्चस्व उन्हें भयभीत नहीं कर सका। उन्होंने अपने समय में पढ़ने की ही नहीं वेद पढ़ने की ज़िद की। गृहस्थ जीवन का परित्याग करके छोटी उम्र में भिक्षुणी होने का निर्णय लेने में उन्होंने जिस साहस का परिचय दिया उससे अधिक इस इरादे को छोड़ने में। इतना ही नहीं उन्होंने इस घटना के प्रेरक कारण का उद्घाटन करने में भी कोई संकोच नहीं किया और उसके बाद अपने निजी जीवन के सामने ऐसी अभेद्य दीवार खींच दी कि उसके भीतर ताक-झाँक करने या पूछताछ करने का अधिकार उन्होंने किसी को दिया नहीं और साहस किसी को हुआ नहीं। उसके बाद लोगों ने उतना ही जाना जितना उन्होंने स्वयं लिखकर बताया। गोकि इस पुस्तक में आत्म स्वीकृतियाँ भी हैं और रचना-प्रक्रिया का विवेचन काफ़ी बेबाक शैली में किया गया है।

निर्मला जैन - हिन्दी की जानी-मानी आलोचक निर्मला जैन का जन्म सन् 1932 में दिल्ली के व्यापारी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में ही शिक्षा पूरी की और वर्षों कत्थक गुरु अच्छन महाराज (बि. महाराज के पिता) से नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। विवाह से पहले बी.ए. तक और विवाह के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम.ए., पीएच.डी. और डी. लिट्. की उपाधियों प्राप्त की। लेडी श्रीराम कॉलेज (1956-70) और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग (1970-1996) में अध्यापन करके सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे विशेष आमन्त्रित रूप से दस वर्ष तक अध्यापन करती रहीं। इस दौरान वे हिन्दी विभाग की अध्यक्ष (1981-84) और अनेक वर्ष तक दक्षिण-परिसर में विभाग की प्रभारी प्रोफ़ेसर रहीं।अध्यापन के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अनेक महत्त्वपूर्ण आलोचना कृतियों की रचना की और प्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद किये। महादेवी और जैनेन्द्र की रचनावलियों के अतिरिक्त कई पुस्तकों का संचयन और सम्पादन भी किया। इन मौलिक, अनूदित और सम्पादित रचनाओं की संख्या तीस से अधिक है।साहित्येतर कलाओं के प्रति रुझान और वाग्मिता निर्मला जैन के व्यक्तित्व का अतिरिक्त आयाम है। साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत के लिए वे निरन्तर देश-विदेश की यात्रा करती रहीं। साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक स्वदेशी-विदेशी संस्थाओं ने सम्मानित किया।निर्मला जैन एक ऐसा सुपरिचित नाम है जिन्होंने अपनी वस्तुनिष्ठ आलोचना दृष्टि और बेबाक अभिव्यक्ति से हिन्दी के पुरुष प्रधान आलोचना-परिदृश्य में उल्लेखनीय जगह बनायी है। उनके अनेक शिष्य महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।ख़ास बात यह है कि आज भी वे पूरी लगन और निष्ठा से अध्ययन और रचना-कर्म में संलग्न हैं और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

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