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Makhan Lal Chaturvedi Rachanawali

by Ed. by Shrikant Joshi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350008492
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 3430
  • Original Price: INR 9000.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 5500 grams
  • BISAC Subject(s): General

माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली – 1 - माखनलाल चतुर्वेदी ने लगातार एक भारतीय अस्मिता को स्थापित करने का प्रयत्न किया, जो स्वाधीनता संघर्ष के युग सन्दर्भ में कोई अचरज की बात नहीं थी, पर समाज को आत्मवान बनाये रखने में भी अविराम भाव से लगे रहे-उन परिस्थितियों में भी जिनमें शरीर भी संकटापन्न रहता है और उस मानसिकता के बीच भी जो सैक्युलरिज़्म के नाम पर आत्मा को ही बिल्कुल नकार देना चाहती थी। सांस्कृतिक और राजनीतिक सन्दर्भ में ये दो बातें कहकर साहित्यिक सन्दर्भ में यह भी कहूँ कि उस युग में, जब अधिकतर लेखक एक विखण्डित व्यक्तित्व वाले लेखक होने लगे थे, माखनलालजी के अखण्डित व्यक्तित्व ने अपने समकालीनों के सामने एक आदर्श भी रखा, एक चुनौती भी खड़ी की। किसी भी देश, किसी भी समाज के लिए अखण्ड व्यक्तित्व बहुत बड़ी उपलब्धि होता है। -स. ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय'चतुर्वेदीजी के साहित्यिक रूप का परिचय मुझे उनके नाटक "कृष्णार्जुन-युद्ध" से पहले-पहल प्राप्त हुआ था। मुझे स्मरण है कि इसे पहली बार पढ़ने पर दो प्रभाव पड़े थे। एक तो यह कि देश के प्राचीन कथानकों को लेकर आधुनिक काल की समस्याओं पर किस प्रकार नया प्रकाश डाला जा सकता है। दूसरे यह कि हिन्दी में साहित्यिक नाटक भी रंग-मंच की दृष्टि से सफलता के साथ लिखा जा सकता है। यह वास्तव में खेद का विषय है कि इस परम्परा को हिन्दी नाटक साहित्य के अन्तर्गत आगे विकसित नहीं किया गया। -डॉ. धीरेन्द्र वर्माप. माखनलाल चतुर्वेदी ने एक साधारण स्कूल मास्टर को हैसियत से उठकर अपने ढंग का जो अनोखा, प्रतापी और मौलिक व्यक्तित्व निर्माण किया है वह सचमुच ही अभिनन्दनीय है', 'वे एक साथ ही शूरातन और श्रृंगार, रस और तेज़, प्रणय और प्रताप के कवि हैं। - के.एम. मुंशीउनका जो कुछ भी साहित्य मैंने पढ़ा है उसमें विचारों की और भावनाओं की आर्यता ही मैंने पायी है। उनके कारण हिन्दी साहित्य की श्री वृद्धि हुई है। उनकी रसिकता से भी लोग प्रभावित हुए हैं उनका स्मरण होने मात्र से चित्त प्रसन्न होता है। -काका कालेलकरयह नाटक चरित्र प्रधान न होकर विचार प्रधान हो गया है। कर्तव्याकर्तव्य के निर्णय में घटना और पात्र इस प्रकार घुल-मिल गये हैं कि उनका स्वतन्त्र व्यक्तित्व मुखरित नहीं होता और न्याय के लिए बलिदान ही मुख्य रूप में समाज के सामने आता है। अतएव इसे न तो घटना-प्रधान और न ही चरित्र प्रधान कहा जा सकता है। अतः इसे विचार प्रधान नाटक कहना ही उचित होगा। पं. माखनलाल ने भारतेन्दु और प्रसाद युग की नाट्यकला को जोड़ने के लिए एक श्रृंखला का कार्य किया। नाटक में विचारों पर बल देना आधुनिक युग की नाट्यकला की विशेषता है। इस मेधावी साहित्यकार ने नाटक को एक नवीन दिशा में मोड़कर नाट्य-क्षेत्र में स्तुत्य कार्य किया। -डॉ. दशरथ ओझा...जब हम माखनलालजी के समस्त गद्य-लेखन पर दृष्टि डालते हैं, तो हमें उसके वैविध्य को देखकर आश्चर्य होता है, कहीं राष्ट्रीय भावना का ओजस्वी प्रकाशन है, कहीं लेखन के सामाजिक दायित्व का आग्रहपूर्ण निवेदन है और कही लेखक दृश्यों और पात्रों के अंकन में रत है और कहीं-कहीं अपने वैष्णव भाव को लिए हुए चिन्तन की गहराइयों में खो गया है। -डॉ. प्रेमशंकरअन्तिम पृष्ठ - कितने संकट के दिन हैं ये। व्यक्ति ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ भूख की बाज़ार-दर बढ़ गयी है, पायी हुई स्वतन्त्रता की बाज़ार-दर घट गयी है। पेट के ऊपर हृदय और सिर रखकर चलने वाला भारतीय मानव मानो हृदय और सिर पर पेट रखकर चल रहा है। खाद्य पदार्थों की बाज़ार-दर बढ़ी हुई है और चरित्र की बाज़ार-दर गिर गयी है।

सम्पादक - श्रीकान्त जोशी - हिन्दी के जानेमाने कवि और गद्यकार श्रीकांत जोशी परम्परा में नवाचार के कवि थे। उनके लेखन में प्रकृति, परिवार, गांव, स्थानीयता, समय और राजनीतिक चेतना का पक्ष और प्रतिपक्ष दिखाई देता है।माखनलाल चतुर्वेदी रचनावली - माखनलाल चतुर्वेदी ने अपने जीवन में अनेक पत्रों का सम्पादन किया। प्रभा, कर्मवीर, प्रताप उनमें से प्रमुख थे। प्रभा (1913 से 1915 तक) दो वर्ष उनके सम्पादन में निकली। प्रताप का सम्पादन हुतात्मा गणेश शंकर विद्यार्थी के जेल जाने पर श्रीयुय श्रीकृष्णदत्त पालीवान के आग्रह पर (अक्तूबर 1923 से मार्च 1924 तक) चतुर्वेदीजी ने किया था। कर्मवीर ही वह पत्र था, जिसका 17 जनवरी, 1920 से लेकर 11 जुलाई, 59 तक उन्होंने अनवरत सम्पादन किया। इसमें से जबलपुर से खण्डवा आने के अन्तराल का तथा उनकी 1920 और 1932 की जेल-यात्राओं का समय निकाल देने पर क़रीबन 35 वर्षों का उनका सुनिश्चित सम्पादन-काल है।कर्मवीर का प्रारम्भ स्वतन्त्रता-संघर्ष के उत्तप्त वर्षों में उस युग की आवश्यकताओं के अनुकूल, मध्य प्रदेश के वर्चस्वी नेतृत्व के परामर्श से हुआ था। स्वतन्त्रता सेनानी श्री माधवराव सप्रे, जो मध्य प्रदेश की पत्रकारिता के आदि-पुरुष थे, के आग्रह पर माखनलालजी को सर्वसम्मति से कर्मवीर का सम्पादन चुना गया था। कर्मवीर का डिक्लेरेशन लेने के लिए जब चतुर्वेदीजी मिस्टर मियाइस (जोकि जबलपुर के ज़िला मैजिस्ट्रेट थे) के पास पहुँचे, तो उन्होंने उनसे पूछा, "आप अंग्रेज़ी वीकली के होते हुए हिन्दी वीकली क्यों निकालना चाहते है?" चतुर्वेदीजी ने रायबहादुर पं. विष्णुदत्तजी शुक्ल (जो कि कर्मवीर के संचालक मण्डल के सदस्य भी थे) की अपेक्षा के ठीक विपरीत जवाब दिया, "आपका अंग्रेज़ी पत्र दब्बू है, मैं वैसा पत्र नहीं निकालना चाहता; मैं ऐसा पत्र निकालना चाहूँगा जिससे कि ब्रिटिश शासन चलते-चलते रुक जाये।" मि. मिथाइस आइरिश सज्जन थे, उन्होंने चतुर्वेदीजी के उत्तर की प्रशंसा की और उन्हें कर्मवीर का डिक्लेरेशन प्रदान कर दिया।

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