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Mann Ke Mrigchhaune

by Pt. Ram Narayan Upadhyaya
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789348724373
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 152
  • Original Price: INR 300.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

पं. रामनारायण उपाध्याय के मन के ये मृगछौने आपके मन-उपवन में वैसे ही कुलाँचें भरेंगे, जैसे मृग मधुवन में भरते हैं। ये कविताएँ अपने लघु आकार में होकर भी अपने दीर्घ संदेश को लेकर अंतर्मन के ताल में संवेदनाओं की काँकरी फेंकती हैं। आदरणीय दादा की इन रचनाओं में आपको यथार्थवाद और छायावाद का आनंद मिलेगा तथा रूपक, उपमाओं की सुरभि भी। कहीं-कहीं ये कविताएँ आपसे संवाद भी करती हैं, कहीं पर समाज के परिवेश पर सलोना व्यंग्य भी करती हैं-"फर्श पर मोजेकदीवारों पर संगमरमरछत में प्लाईवुडकहीं माटी का कतरा नहीं..बिना माटी का स्पर्श पाए.यहाँ कुछ उगेगा कैसे."उनकी रचनाओं में प्रतीकों और बिंबों का सहज आगमन चमत्कृत करता है, इसी कारण ये सहज-सरल, निश्छल रचनाएँ बड़ी अपनी सी और मन के करीब लगती हैं।

पं. रामनारायण उपाध्याय का जन्म 20 मई, 1918 को हुआ। रामा दादा की कचहरी में अकसर मित्रों, साहित्यकारों संग खूब ठहाके लगते रहते थे। खंडवा वाले घर का संपूर्ण वातावरण साहित्यिक और राजनीतिक था। साहित्य की विभिन्न विधाओं में दादा की लगभग 53 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। 'निमाड़ की लोक-संस्कृति' के उत्थान के लिए वे आरंभ से जुड़े थे। उनकी पहली पुस्तक 'निमाड़ी लोकगीत' वर्ष 1949 में प्रकाशित हुई, तदुपरांत 'जाने', 'रेखाचित्र के रूप में अनजाने', 'जाने-पहचाने' 1953 में, व्यंग्य में 'गरीब और अमीर' 1958 में, इसी वर्ष दूसरी पुस्तक 'जब निमाड़ गाता है' आई। वर्ष 1965 में ' संत सिंगाजी एक अध्ययन' आई। बाल-साहित्य में प्रकाशित 'चतुर चिड़िया' पर उन्हें 1962-63 में अकादमी सम्मान मिला। उनके संपूर्ण साहित्यिक वाङ्मय को देखते हुए उन्हें सन् 1991 में 'पद्मश्री' से अलंकृत किया गया। दादा ने अपने संपूर्ण जीवन को जनसेवा, परोपकार और साहित्य में लगा दिया। वे 'लोक-साहित्य' के बड़े अध्येता रहे। उन्होंने 'म.प्र. आदिवासी लोक-कला परिषद्' की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई तथा जन-सहयोग से भवन बनवाकर 'निमाड़ लोक-संस्कृति न्यास' की स्थापना की, जिसमें लोक-शोध हेतु निःशुल्क पुस्तकें रखी गईं। स्मृतिशेष: 20 जून, 2001।

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