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Mantrimandal

by Rajkrishan Mishr
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170554875
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 639
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 900 grams
  • BISAC Subject(s): General

मंत्रिमंडल - उस दिन राजभवन में, मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण में, केवल तीन मंत्री बन पाये थे, स्वयं उत्सुकदास, दूसरे लोबीराम और तीसरे थे भीमसिंह। उत्सुकदास का मन बड़ा उदास था...उत्सुकदास बोले, 'बाबा, यद्यपि मुझे मुख्यमंत्री बना दिया गया है, मेरे किसी आदमी को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है। यहाँ तक कि मेरे विशेष राजनैतिक शिष्य को मंत्री बनाना तो दूर रहा, पार्टी से निलम्बित होने तक से मैं नहीं रोक सका...' "भारतीय राजनीति को अपने मौन के चलते कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया है इन मौनी बाबाओं ने!राजनीतिक उपन्यासों के लेखन में सिद्धहस्त राजकृष्ण मिश्र के इस नये उपन्यास में एक प्रदेश के बहाने पूरे भारत राष्ट्र की राजनीतिक दशा-दुर्दशा को बेनक़ाब किया गया है।लेखक का दावा है कि उनके राजनीतिक उपन्यासों के इन तीन खंडों (काउंसिल हाउस, दारुलशफ़ा और मंत्रिमंडल) को पढ़ने के बाद, पढ़नेवाला वह व्यक्ति नहीं रहेगा, जो वह पहले था।अन्तिम पृष्ठ आवरण - सभी को जाना था बलदेव चौधरी के पास। सभी को तलाश थी बलदेव चौधरी की। किसी को नहीं मालूम था, बलदेव चौधरी उनका कल्याण कैसे करेंगे, कैसे उनको मंत्रिमंडल में शामिल करवा सकते हैं। बलदेव चौधरी ने असल में एक दाँव फेंका था, एक चाल चली थी। वह दाँव, वह चाल सीधा हमला था हाईकमांड पर। लेकिन उस बयान का सीधा असर हुआ था, विधायकों के ऊपर उन तमाम विधायकों के अन्दर, जिनको किसी तरह की, किसी प्रकार की उम्मीद नहीं थी, जीवन में कभी भी मंत्रिमंडल में आने का सपना भी जो देख सकने की स्थिति में नहीं थे, वे सब उस मौके पर अपनी-अपनी किस्मत आज़माने के लिए निकल पड़े थे। कोई राज्यमंत्री बनना चाहता था, कोई उपमंत्री, कोई कैबिनेट मंत्री किसी को मंत्री न बनाये जाने पर किसी सार्वजनिक निगम का अध्यक्ष तो किसी-किसी को गैस एजेंसी पेट्रोलपम्प या कोटा, परमिट मिलने की उम्मीद थी...

राजकृष्ण मिश्र - जन्म : 3 अगस्त, 1940 को वाराणसी में। सृजन: खलील जिब्रान और गुरुदेव टैगोर की गीतांजलि की परम्परा में 'कामना का क्षितिज' शीर्षक से रेखाचित्र (1975), उपन्यास-त्रयी 'काउंसिल हाउस', 'दारूलशफ़ा' और 'मंत्रिमंडल' (1996), 'हैलो' (उपन्यास-1985) और 'कुतो मनुष्य' (उपन्यास-1994), 'चालान' (नाटक 1978), 'बजट' (नाटक-1996), 'आईना' ( कहानी-संग्रह - 1996), 'बिखराव का संकट' (निबन्ध-संग्रह - 1996) में प्रकाशित। सम्मान : वर्ष 1984, 1985 में साहित्य अकादेमी के लिए 'सचिवालय' (काउंसिल हाउस) नामांकित।आपकी कृतियों पर लखनऊ विश्वविद्यालय में स्वतन्त्र शोधकार्य चल रहा है। पिछले डेढ़ दशक से विभिन्न विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर पीएच. डी., डी. लिट्. के शोध ग्रन्थों में उपन्यास त्रयी के शुरुआती दो खंडों को रेखांकित और उल्लेखित किया जा रहा है।

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