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Mera Japan

by Vedprakash Singh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789369448265
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 140
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 350 grams
  • BISAC Subject(s): Essays

मेरा जापान - यह पुस्तक जापान और भारत के बीच सांस्कृतिक, शैक्षिक और ऐतिहासिक सम्बन्धों पर आधारित है, जिसमें लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से जापान को समझने की कोशिश की है। यह एक बहुआयामी पुस्तक है, जिसमें जापान के विभिन्न पहलुओं, जैसे-जापानी संस्कृति, शिक्षा, गांधी जी के साथ जापान का सम्बन्ध और जापान में हिन्दी का प्रभाव आदि पर गहरे विचार प्रस्तुत किये गये हैं।व्यक्तिगत अनुभव और अध्ययन के सन्दर्भ में देखें तो शुरू के कुछ अध्याय, कुछ अध्याय, जैसे- 'जापान से मेरी पहली मुलाक़ात', 'उगुइसु की आवाज़' और 'जापानी राग मिरवा' यह दर्शाते हैं कि लेखक ने जापान के सांस्कृतिक पहलुओं को व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से जाना है। इन अध्यायों में जापान की प्राकृतिक सुन्दरता, संस्कृति और कला के बारे में लिखा गया है। लेखक ने जापानी जीवनशैली और वहाँ के माहौल को बहुत अच्छे तरीक़े से वर्णित किया है। सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्दर्भ के रूप में देखें तो पुस्तक में गांधी जी, रासबिहारी बोस और जवाहरलाल नेहरू के सम्बन्धों पर आधारित अध्याय, जैसे- 'गांधी जी और उनके तीन बन्दर' और 'गांधी जी और जापान' जापान और भारत के ऐतिहासिक सम्बन्धों की ओर इशारा करते हैं । इन अध्यायों में गांधी जी की विचारधारा और जापान की भूमिका पर विचार किया गया है। वहीं 'क्या आपने रासबिहारी बोस का नाम सुना है?' में जापान पहुँचे भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम के विस्मृत नायक रासबिहारी बोस की भूमिका को समझाया गया है, तो 'जवाहरलाल नेहरू के हाथ की गरमाहट अभी भी याद है' में नेहरू से जुड़ी यादों को अमूल्य निधि की तरह सँजोया गया है। शैक्षिक और सांस्कृतिक अन्तर के रूप में देखें तो 'जापान की प्राथमिक शिक्षा' और 'जापानी शिक्षा-व्यवस्था में श्रम का महत्त्व' जैसे अध्याय जापान की शिक्षा-प्रणाली पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। ये अध्याय बताते हैं कि कैसे जापान में शिक्षा और श्रम का सम्बन्ध अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है और यह देश अपने युवाओं को एक ख़ास तरीके से तैयार करता है। 'तोत्तो चान और उसका अनोखा विद्यालय' में जापान की शिक्षा-प्रणाली के एक अद्वितीय उदाहरण पर चर्चा की गयी है।हिन्दी भाषा और साहित्य के सन्दर्भ में देखें तो 'जापान में हिन्दी : इतिहास और वर्तमान', 'हिन्दी का यात्रा-साहित्य और जापान' और 'जापानी विद्यार्थियों को हिन्दी-अध्यापन के अनुभव' जैसे अध्याय जापान में हिन्दी भाषा और साहित्य पर प्रकाश डालते हैं। इन अध्यायों के माध्यम से लेखक ने जापान में हिन्दी के महत्त्व और इसके शिक्षण के अनुभवों को साझा किया है।समाज और संस्कृति में परिवर्तन के दृष्टिकोण से देखें तो 'परदेस-चुनौतियाँ और सम्भावनाएँ : जापान के विशेष सन्दर्भ में' और 'भारत और जापान के युवाओं में देशभक्ति की भावना का स्वरूप' जैसे अध्याय सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों की पड़ताल करते हैं । यहाँ लेखक ने जापान और भारत के बीच सामूहिक संघर्षों और सहयोग के बारे में विचार किया है।कुल मिलाकर देखें तो यह पुस्तक लेखों, निबन्धों आदि के ज़रिये न केवल जापान से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डालती है, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति के साथ जापान से जुड़े सम्बन्धों को भी विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती है। निस्सन्देह, यह पुस्तक उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो जापान और भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के बारे में अधिक जानना चाहते हैं।

वेदप्रकाश सिंह - वर्तमान में जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ा रहे डॉ. वेदप्रकाश सिंह का जन्म 5 अप्रैल 1983 को मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.ए., एम.ए. और एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से 'हिन्दी कहानी में भूमण्डलीकरण की संस्कृति के प्रभाव का अध्ययन' विषय पर पीएच. डी. की। दिल्ली विश्वविद्यालय के कई महाविद्यालयों में लगभग पाँच वर्षों तक अध्यापन किया। 2017 से जापान में अध्यापन-कार्य कर रहे हैं।भारत और दुनिया भर की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में पचास से अधिक आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। चार किताबें प्रकाशित हैं, जिनके नाम हैं-‘हिन्दी कहानी और भूमण्डलीकरण’, मे’रा जापान’, ‘सार्थक विचारों की ज़रूरत तथा उपनिवेशवाद और विद्रोह’। इनके साथ ही 'ज्वालामुखी' नामक पत्रिका को किताब-रूप में सम्पादित किया है। ‘तोमिओ मिज़ोकामि : व्यक्तित्व और रचना-समग्र’ नाम से एक पुस्तक सम्पादित की है। ‘अन्तरदेश' नामक पत्रिका का जापान विशेषांक सम्पादित किया है।इन्होंने ‘उभरते भारत की तस्वीर’ और ‘अब दुनिया गोल नहीं’ शीर्षक से दो किताबों का आंशिक अनुवाद भी किया है।'दिल की दुकान', 'ईदगाह', 'भोलाराम का जीव' और 'अन्धेर नगरी' आदि नाटकों का जापानी विद्यार्थियों के लिए संवाद-लेखन और निर्देशन किया है।भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और मॉरीशस में आयोजित राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भाषण दे चुके हैं। अनेक आभाषी मंचों पर तीस से अधिक भाषण दे चुके हैं। आधुनिक हिन्दी साहित्य, जापान और भारत के सम्बन्ध पर निरन्तर लेखन-कार्य कर रहे हैं।

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