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Meri Katha Yatra

by Vidyasagar Nautiyal
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788181437815
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 428
  • Original Price: INR 300.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 500 grams
  • BISAC Subject(s): Essays & Travelogues

मेरी कथा-यात्रा - विद्यासागर नौटियाल हिन्दी के उन वरिष्ठ कथाकारों में से हैं जो पूरे मन से यह मानते हैं कि उन्हें समाज का बकाया चुकता करना है। वह भी इस तरह की रचना और पाठक के बीच रचनाकार की उपस्थिति कम से कम हो। रचना पाठक से व पाठक रचना से अपना सम्बन्ध स्वयं बनाये। ज़िन्दगी के 74 पन्नों से यह 54 कहानियाँ इस बात की गवाह हैं कि नौटियाल जी का कथाकार सौद्देश्य लेखन में यकीन रखता है। ये लेखक की अब तक उपलब्ध हो सकी समग्र कहानियों में से चयनित का संकलन है।लेखक की पहली कहानी 'मूक बलिदान' 1951 में प्रकाशित हुई थी। 1953 तक कथाकार के नाम में 'दुर्वासा' भी जुड़ा रहा, लेकिन 'भैंस का कट्या' के प्रकाशन के साथ 1953 में यह संज्ञा अलग हो गयी। कम लोग जानते होंगे कि नौटियाल जी ने बनारस प्रवास से पूर्व देहरादून में भी कहानियाँ लिखी थीं। हाँ, यह सच है कि ख़ुद लेखक अपने बनारस प्रवास को लेखकीय जीवन के लिए एक उपलब्धि मानते हैं।उनके कथाकार मन को पहाड़ की स्त्री ने अधिक आकर्षित किया है तो इसके अपने तर्क भी हैं। अतीत के अकिंचनों को भी इस कथाकार ने कथा का विषय बनाया है तो इसलिए कि जन-इतिहास की धारा अवरुद्ध न हो। उनकी कथायात्रा एक तरह से रचनाकार के आत्मगौरव और आत्मविश्वास की कथा है। उसमें समय और समाज की विसंगतियाँ धरती की गन्ध के साथ उभर कर आयी हैं।कहना ज़रूरी है कि तीस बरसों के अन्तराल के बाद नौटियाल जी 'फट जा पंचधार' के ज़रिये साहित्य की दुनिया में ऐसे लौटे कि उनकी लेखनी फिर से गतिवान हो उठी। लोक से प्रेरणा लेकर इरादतन लोक के लिए लेखन करने वाले इस प्रतिबद्ध कथाकार की समग्र कहानियों का हिन्दी-जगत को भरपूर स्वागत करना चाहिए।-महेश दर्पण

विद्यासागर नौटियाल - जन्म : 29 सितम्बर, 1985, मागीरथी तट पर बसे मालीदेवल गाँव में शिक्षा टिहरी, देहरादून, काशी हिन्दू विश्वविद्याल सन् 1954 में कल्पना अपनी पहली कहानी भैंस का कट्या के प्रकाशन के साथ साहित्य जगत में अपनी पहचान स्थापित करवा लेने वाले विद्यासागर की साठ से अधिक कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। अपनी रचनाओं में वे पर्वतीय प्रदेश से बाहर नहीं निकलते उस पहाड़ के दबे-कुचले लोगों के बारे में लिखते हैं, जो उनके अनुसार 'सदियों से मेरे भीतर भरा है।'बहुत छोटी उम्र में टिहरी गढ़वाल रियासत के विरुद्ध छेड़े गये जन-आन्दोलन में शामिल होने के कारण विद्यासागर एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाने लगे। 1980 में देवप्रयाग टिहरी से कम्युनिस्ट विधायक निर्वाचित टिहरी उत्तरकाशी के क़रीब-क़रीब समस्त ग्रामों का पैदल भ्रमण करने के अलावा उच्चतम हिमाच्छादित शिखरों की यात्राएँ भी कीं। चिपको आन्दोलन के प्रारम्भिक कार्यकर्ता।टिहरी बाँध के निर्माण के फलस्वरूप अपने गाँव व शहर से बलात विस्थापित होने के बाद अब देहरादून में स्थायी तौर पर निवास।

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