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Mujhe Ghar Le Chalo

by Taslima Nasrin
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181436665
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 360
  • Original Price: INR 400.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 600 grams
  • BISAC Subject(s): General

मुझे घर ले चलो - तसलीमा नसरीन का जन्म 25 अगस्त, 19621 बांग्लादेश के मयमनसिंह में! डॉक्टर की डिग्री हासिल करने के बाद, सन् 1999 तक डॉक्टर के तौर पर सरकारी अस्पताल में नौकरी! सरकारी नौकरी में बने रहने के लिए, लिखना छोड़ना होगा- यह हुक्मनामा पाकर सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा।अपने लेखन के लिए असाधारण लोकप्रियता अर्जित की और काफ़ी चर्चित रहीं। औरत की आज़ादी में धर्म और पुरुष सत्ता सबसे बड़ी बाधा बनती है- बेहद साफ़गोई से इस पर विचार करते हुए, धर्म औरत की राह में बाधक कैसे हो सकता है, इसके समर्थन में, बेबाक बयान दिया है। इस साहस के लिए वे सिर्फ़ गँवार जाहिल कट्टर धर्मवादियों के ही हमले की शिकार नहीं हुई, बल्कि समूची राष्ट्र-व्यवस्था और पुरुष वर्चस्व प्रधान समाज ने उनके ख़िलाफ़ जंग की घोषणा कर दी। देश के समस्त कट्टरवादियों ने तसलीमा को फाँसी देने की माँग करते हुए, आन्दोलन छेड़ दिया। यहाँ तक कि उनके सिर का मोल भी घोषित कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उन्हें अपने प्रिय स्वदेश से निर्वासित होना पड़ा। उनके देश में आज भी उनके ख़िलाफ़ फ़तवा झूल रहा है; तसलीमा का ही नहीं बल्कि वाक स्वाधीनता के विरोधी असंख्य लोगों के द्वारा ठोंके गये मामले झूल रहे हैं! मानवता की हिमायत में, सत्य तथ्यों पर आधारित उपन्यास, 'लज्जा'; अपने शैशव की यादें दुहराता हुआ, 'मेरे बचपन के दिन'; किशोर और तरुणाई की यादों का बयान करता हुआ, 'उत्ताल हवा'; आत्मकथा का तीसरा और चौथा खण्ड 'द्विखंडित' और 'वे सब अँधेरे'-इन पाँचों पुस्तकों को बांग्लादेश सरकार ने निषिद्ध घोषित कर दिया है! पश्चिम बंगाल में विभिन्न सम्प्रदायों के लोगों में दुश्मनी जाग सकती है, इस आशंका का वास्ता देकर और बाद में किसी एक विशेष सम्प्रदाय के धार्मिक मूल्यबोध पर आघात किया गया है, इसकी दुहाई देते हुए, उनकी आत्मकथा का तीसरा खण्ड-'द्विखंडित' पश्चिम बंगाल सरकार ने भी निषिद्ध कर दिया। पूरे एक वर्ष, नौ महीने, छब्बीस दिन तक निषिद्ध रहने के बाद, हाईकोर्ट की निर्णय के मुताबिक यह निषेध उठा लिया गया। दोनों बंगाल में इस खण्ड के ख़िलाफ़ (पश्चिम बंगाल में 'द्विखंडित' और बांग्लादेश में 'क') उनके समकालीन लेखकों द्वारा कुल इक्कीस करोड़ रुपये का मामला दायर किया गया है।

तसलीमा नसरीन ने अनगिनत पुरस्कार और सम्मान अर्जित किए हैं, जिनमें शामिल हैं - मुक्त चिन्तन के लिए यूरोपीय संसद द्वारा प्रदत्त - सखारव पुरस्कार; सहिष्णुता और शान्ति प्रचार के लिए यूनेस्को पुरस्कार; फ्रांस सरकार द्वारा मानवाधिकार पुरस्कार; धाखमक आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए फ्रांस का ‘एडिट द नान्त पुरस्कार’; स्वीडन लेखक संघ का टूखोलस्की पुरस्कार; जर्मनी की मानववादी संस्था का अर्विन फिशर पुरस्कार; संयुक्त राष्ट्र का फ्रीडम फ़्राम रिलिजन फाउण्डेशन से फ्री थॉट हीरोइन पुरस्कार और बेल्जियम के मेंट विश्वविद्यालय से सम्मानित डॉक्टरेट! वे अमेरिका की ह्युमैनिस्ट अकादमी की ह्युमैनिस्ट लॉरिएट हैं। भारत में दो बार, अपने ‘निर्वाचित कलाम’ और ‘मेरे बचपन के दिन’ के लिए वे ‘आनन्द पुरस्कार’ से सम्मानित। तसलीमा की पुस्तकें अंग्रेजी, फ्रेंच, इतालवी, स्पैनिश, जर्मन समेत दुनिया की तीस भाषाओं में अनूदित हुई हैं। मानववाद, मानवाधिकार, नारी-स्वाधीनता और नास्तिकता जैसे विषयों पर दुनिया के अनगिनत विश्वविद्यालयों के अलावा, इन्होंने विश्वस्तरीय मंचों पर अपने बयान जारी किए हैं। ‘अभिव्यक्ति के अधिकार’ के समर्थन में, वे समूची दुनिया में, एक आन्दोलन का नाम बन चुकी हैं।

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