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Nati Ki Pooja Aur Mukut | Raktakarabi By Rabindra Nath Thakur

by Rabindra Nath Thakur
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789348724113
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 176
  • Original Price: INR 300.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

रक्तकरबी नाटक की कथा एक काल्पनिक समाज में घटित होती है, जहाँ लोगों का शोषण होता है और हर व्यक्ति को अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कहानी की मुख्य नायिका, "नाती", एक प्रतीक है जो असमानता और शोषण के खिलाफ खड़ा है।मुकुट नाटक का एक अन्य महत्वपूर्ण भाग है, जो सत्ता, सम्मान, और अधिकार के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह एक प्रतीकात्मक वस्तु है, जो नाटक में मानवता, सत्ता की भूख, और उसके परिणामों को दर्शाती है। यह मुकुट केवल एक भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि यह उस अधिकार और शक्ति का प्रतीक है, जिसे लोग प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन साथ ही यह उनके जीवन को प्रभावित भी करता है।

रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर और शारदा देवी की संतान के रूप में 7 मई, 1861 को कलकत्ता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनकी स्कूली शिक्षा प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। लंदन विश्वविद्यालय से कानून का अध्ययन किया। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ। बचपन से ही कविता, छंद और भाषा में उनकी अद्भुत प्रतिभा का आभास मिलने लगा था। उन्होंने पहली कविता आठ साल की आयु में लिखी थी और 1883 में केवल सोलह साल की आयु में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई।भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकनेवाले युगद्रष्टा टैगोर के सृजन संसार में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अंग्रेजी अनुवाद के बाद उनकी प्रतिभा की आभा पूरे विश्व में फैली। प्रकृति के सान्निध्य में एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर ने शांतिनिकेतन की स्थापना की। सन् 1913 में उनकी काव्य-रचना 'गीतांजलि' के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला।स्मृतिशेष : 7 अगस्त, 1941 ।

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