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Neelee Aandhi

by Suchitra Bhattacharya
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789352295913
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 274
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 500 grams
  • BISAC Subject(s): Comics & Graphic Novels

नीली आँधी -झकझक स्मार्ट सौमिक बसुराय के साथ दयिता का विवाह तय हो गया। लेकिन दयिता किसी अजीब इन्सान के मोहपाश में बँधी हुई, जिसे वह प्यार समझ बैठती है, वह शख़्स है, उसका प्रोफ़ेसर, विश्वविख्यात वैज्ञानिक-बोधिसत्व मजूमदार! दयिता का प्यार मानो कोई दुर्धर्ष आँधी-तूफ़ान है, जो उम्र की कोई बाधा-निषेध नहीं मानता; नाते-रिश्तेदारों की परवाह नहीं करता; समाज-संसार के नीति-नियमों को वह तिनके की तरह, वक़्त की धार में बहा देती है। महाविश्व की सृष्टि-रहस्य जानने के रिसर्च में विभोर, अधेड़ बोधिसत्व मजूमदार भी दयिता के अमोघ आकर्षण की आख़िर उपेक्षा नहीं कर पाये। पत्नी-पुत्र त्यागकर, वे दयिता के साथ अपनी नयी दुनिया बसा लेते हैं।दयिता और बोधिसत्व की समवेत ज़िन्दगी क्या ख़ुशहाल हो पायी? दयिता द्वारा ठुकराया हुआ सौमिक क्या उसे भूल पाया? पति-परित्यक्ता राखी के मन में ही बोधिसत्व के लिए, अन्त में कितनी-सी श्रद्धा और प्यार बचा था?'नीली आँधी' जटिल प्यार का बयान है। लेकिन यह उपन्यास सिर्फ़ प्यार के त्रिकोण का उपाख्यान ही नहीं है, औरत-मर्द के रिश्तों की रस्साक़शी के माध्यम से, लेखिका को यह भी तलाश है कि अनन्य प्रतिभा सम्पन्न इन्सानों के जीवन में औरत की जगह कहाँ है! कुल मिलाकर सुचित्रा भट्टाचार्य की सशक्त क़लम ने वर्तमान युग की जीवन-यन्त्रणा को उजागर किया है।'नीली आँधी' इसी वक़्त का तूफ़ानी भँवर है, जो समकालीन होते हुए भी, चिरकालीन है। आँधी नीली हो या पीली, हर इन्सान की ज़िन्दगी में दाख़िल ज़रूर होती है। जो कमज़ोर होते हैं, आँधी उन्हें उड़ा ले जाती है और सख्त सजा देती है, उनका सब कुछ छीन लेती है। जो वह आँधी बहादुरी से झेल जाते हैं, ज़िन्दगी सुख बनकर, उनका अधूरापन मिटा देती है। विराट व्यक्तित्व दुनिया की नज़रों में भले असाधारण हो, मगर जब उनका पदस्खलन होता है, तो वे निहायत कमज़ोर और मामूली इन्सान साबित होते हैं, जबकि मामूली इन्सान, इन्सानियत का परिचय देकर, असाधारण साबित होते हैं इन तमाम अहसासों ने मुझे अमीर बना दिया है। -सुशील गुप्ता

सुचित्रा भट्टाचार्य - जन्म भागलपुर, सम्वत् 1356, 25 पूस। कई कई तरह की अजीबोग़रीब नौकरियों के बाद, फिलहाल सरकारी अफ़सर!'आमी रायकिशोरी', 'जोखिन जुद्ध', 'काँचेर दीवार' और 'दहन', 'परदेस', 'अपने लोग', 'उड़ते बादल', 'हेमन्त का पंछी' वग़ैरह अनगिनत उपन्यास!औरत के पक्ष में, औरत की अपनी निजी दुनिया की बातें; उनके अपने दुःख-दर्द-पीड़ा; उनकी समस्याएँ और उपलब्धियों की कथा व्यथा! सुचित्रा के लेखन में घूम-फिरकर इन्सानी सरोकार और आपसी रिश्तों की विभिन्न दिशाएँ, उन्मुक्त होती हैं। ज़िन्दगी की अनगिनत जटिलताओं को कलमबन्द किया है।अनुवादक - सुशील गुप्ता - महत्त्वाकांक्षा इन्सान को आगे बढ़ाती है, लेकिन अतिशय महत्त्वकांक्षा उसे तबाह कर देती है। हम सब जिस कालखण्ड में साँस ले रहे हैं, वह सच ही 'ध्वंसकाल' है। इन्सान अपने लोभ, चाह, दुनियादारी ज़रूरतों को येन-केन-प्रकारेण पूरा करने की पागल दौड़ में अपने आदर्शों की बलि दे देता है और तब उसके जीवन, उसके रिश्तों, उसके मूल्यबोध में 'ध्वंस' उतरता है तथा सारे सपने, सुख-चैन समेट ले जाता है। लेकिन, अभी भी वक़्त है! अपने किये हुए गुनाहों का सच्चा प्रायश्चित्त, उसे अपने को नये सिरे से रचने-गढ़ने का मौका देता है, इस उम्मीद और आश्वासन के साथ, 'ध्वंसकाल' की परिसमाप्ति के इन्तज़ार में हूँ, ताकि जीवन और रिश्तों की नयी सुबह हो!अब तक 65 बांग्ला उपन्यासों का अनुवाद।

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