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Neend Nahin Jaag Nahin

by Aniruddh Umat
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789388684033
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 102
  • Original Price: INR 175.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): General

गद्य की आत्मीय परम्परा के रचनाकार अनिरुद्ध उमट का यह नवीनतम उपन्यास है- 'नींद नहीं जाग नहीं।' एक युवती प्रेम और राग की डोर से बँधी अपना एकाकी जीवन जी रही है जिसे संगीत की स्मृति भी अनुराग का उत्ताप याद दिलाती है। अनिरुद्ध उमट अपनी हर रचना में तिलिस्म के तहख़ाने रचते हैं। इस रचना की नायिका अभिसारिका नहीं है, लेकिन जाना, आना, रुकना, प्रतीक्षा करना उसकी नियति है। वह बिस्तर पर आधी चादर बिछाकर लेट जाती है। उसके उदास एकान्त में प्रेम की स्मृति किशोरी अमोनकर के गाये राग ‘सहेला रे, आ मिल गा' के स्वर में बन उठती है। प्रेमी का चला जाना उसे सूने स्टेशन, यशोधरा की प्रतीक्षातुर आँखें और किसी परिचित सिगरेट गन्ध से जोड़ता चलता है। अनिरुद्ध उमट की बेचैन भाषा में प्रेमिका की आकुलता पकड़ने की लपट और छटपटाहट है। ऐसी भाषा कई दशक बाद किसी प्रेम-कहानी में पढ़ने को मिली है। आख़िरी बार निर्मल वर्मा के उपन्यास 'वे दिन' में आत्मीयता, उद्विग्नता और उदासी की त्रिपथगा महसूस की गयी थी। इस बिम्बात्मक कृति में ऊष्मा है, उत्ताप है, रक्तचाप है। कोई आश्चर्य नहीं कि इस छोटी-सी रचना का बड़ा प्रभाव हमारी नसों पर पड़ता है। हम यथार्थवाद के भौतिक शब्दजाल से इतर राजस्थान की खण्डहर हवेली, धोरों, निर्जन स्टेशनों के इन्द्रजाल में फँसे कामना करते हैं कि युवती का प्रेमी वापस आ जाये। अकेले जीवन की जटिल परतों से गुज़रती हुई ‘नींद नहीं जाग नहीं' की नायिका दुखान्त को प्राप्त होती है। इससे पहले अनिरुद्ध उमट अपने दो उपन्यासों से एक विशिष्ट पहचान बना चुके हैं- 'अँधेरी खिड़कियाँ' और 'पीठ पीछे का आँगन' से। विख्यात साहित्यकार कृष्ण बलदेव वैद ने उपन्यास ‘पीठ पीछे का आँगन' पढ़कर कहा था, 'तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि प्रयोगवादी उपन्यास भी उपन्यास ही है। साधारण यथार्थ में बगैर भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे-कहने का मतलब यह है कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया।' अक्क महादेवी और मीरा की बेचैनी अपने मन में समोये नायिका अपने कभी न लौटने वाले नायक की प्रतीक्षा में भटक रही है। कथा के कत्थई पृष्ठों के ख़त्म होते-न-होते कथा का अवसान होता है मानो जीवन विदा लेता है। प्रेम की त्रासदी जीवन की त्रासदी में परिणत हो जाती है और हमें लियो टॉलस्टॉय का वह अमर वाक्य याद आ जाता है- 'सुखी परिवार सब एक से होते हैं। हर दुखी परिवार की अलग कहानी होती है।' -ममता कालिया

अनिरुद्ध उमट 28 अगस्त, 1964 को बीकानेर (राजस्थान) में जन्म। हिन्दी में पिछले तीस सालों से भी अधिक समय से कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, निबन्ध, संस्मरण, समीक्षा आदि का लेखन व प्रकाशन-प्रसारण। उपन्यास 'अँधेरी खिड़कियाँ' 1998 एवं ‘पीठ पीछे का आँगन' 2000 में, कविता-संग्रह ‘कह गया जो आता हूँ अभी' 2005 एवं 'तस्वीरों से जा चुके चेहरे' 2015 में प्रकाशित। कहानी-संग्रह 'आहटों के सपने' 2008, निबन्ध-संग्रह ‘अन्य का अभिज्ञान' का 2012 में प्रकाशन। राजस्थानी भाषा के कवि वासु आचार्य के साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत कविता-संग्रह ‘सीर रो घर' का हिन्दी अनुवाद केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित। सम्मान : राजस्थान साहित्य अकादेमी, उदयपुर द्वारा उपन्यास 'अँधेरी खिड़कियाँ' को ‘रांगेय राघव स्मृति सम्मान' । भारत सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा ‘जूनियर फेलोशिप' के अलावा कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप भी मिली है। सम्पर्क : अनिरुद्ध उमट, माजी सा की बाड़ी, राजकीय मुद्रणालय के समीप, बीकानेर-334001 ।

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