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Nibandhon Ki Duniya: Balmukund Gupt

by Ed. by Nirmala Jain
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789350000502
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 170
  • Original Price: INR 95.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): Essays

बालमुकुन्द गुप्त - निबन्धों की दुनिया - बालमुकुन्द गुप्त का नाम लेते ही शिवशम्भु के ऐतिहासिक चिट्ठों की याद आती है, जिनकी वैचारिक प्रखरता और विशिट तेवर ने उन्हें हिन्दी साहित्य की अमर कृति बना दिया है। यह एक कृति ही, हिन्दी निबन्ध के इस शीर्ष पुरुष की कीर्ति का स्थायी आधार बन चुकी है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस अद्वितीय रचना की छाया में बालमुकुन्द गुप्त की रचनात्मकता के अन्य सशक्त आयाम धुँधला से गये हैं। इस संकलन में 'शिवशंभु के चिट्ठे' के यादगार निबन्ध तो हैं ही, रेखा सेठी ने प्रभूत शोध और श्रम से इस विस्तृत और बिखरी सामग्री से उन प्रतिनिधि रचनाओं का भी संकलन किया है जो गुप्त जी के व्यापक सरोकारों और वाग्वैदिग्ध्य की उतनी ही प्रखर छवि पेश करती हैं। जिसे ठेठ हिन्दी का ठाट कहते हैं, उसकी छटा इस संकलन की प्रत्येक रचना की पंक्ति-पंक्ति में दिखाई देती है। गुप्त जी ने व्यंग का इस्तेमाल एक नुकीले अस्त्र की तरह किया। उनके व्यंग्य में असहायता की चीख नहीं, सकर्मक चेतना का उद्घोष है। वे तत्कालीन भारतीय समाज की कमियों और कमज़ोरियों पर भी उतना ही तीख़ा वार करते हैं जितना ब्रिटिश शासकों पर। बालमुकुन्द गुप्त पराधीन भारत की वेदना के सक्षम प्रवक्ता और भारतीय समाज की कमियों के कटु आलोचक ही नहीं थे, वरन उन्होंने अपनी ख़ास शैली में साहित्य और भाषा की तत्कालीन समस्याओं पर भी बेलाग विचार व्यक्त किये। इसके कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण भी इस पुस्तक में पढ़ने को मिलेंगे। हिन्दी की ताक़त और सरोकारों की गहराई का साक्षात्कार करने के इच्छुक पाठक समुदाय के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक, जिसे पढ़ने का आनन्द हासिल करने के लिए कभी भी हाथ में लिया जा सकता है।

निर्मला जैन (प्रधान सम्पादक) - 'निबन्धों की दुनिया' श्रृंखला की प्रधान सम्पादक निर्मला जैन हिन्दी के विशिष्ट आलोचकों में हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष रही हैं। निर्मला जैन ने बहुत-सी किताबें लिखी हैं तथा अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद और कई पुस्तकों का सम्पादन किया है। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं: रस सिद्धान्त और सौन्दर्यशास्त्र, उदात्त के विषय में (लॉगिनुस की मूल पुस्तक के अनुवाद सहित), काव्य चिन्तन की पश्चिमी परम्परा और कथाप्रसंग : यथाप्रसंग। निर्मला जैन को अनेक सम्मानों तथा पुरस्कारों से समादृत किया गया है।रेखा सेठी - इन्द्रप्रस्थ कॉलेज में हिन्दी की रीडर रेखा सेठी की शोध कृति 'व्यक्ति और व्यवस्था : स्वातन्त्र्योतर हिन्दी कहानी का सन्दर्भ' को भरपूर प्रशंसा मिली है। उन्होंने 'समय के संग साहित्य' तथा 'कालजयी कहानियाँ' का सम्पादन किया है। पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेखों और पुस्तक समीक्षाओं को आदर और रुचि के साथ पढ़ा जाता है।बालमुकुन्द गुप्त - जन्म सन् 1865 में हरियाणा के रोहतक ज़िले के गुड़ियानी गाँव में। राजा राममोहन राय की जीवनी तथा योगेशचन्द्र के बांग्ला बसु उपन्यास 'मडेल भगिनी', हर्षवर्द्धन के संस्कृत नाटक 'रत्नावली' का हिन्दी रूपान्तर किया फिर रंगलाल मुखोपाध्याय द्वारा लिखित पुस्तिका 'हरिदास' का पहले उर्दू में फिर हिन्दी में रूपान्तर किया। 'सती प्रताप' नामक नाटक का हिंदी से उर्दू में अनुवाद। पं. दीनदयालु शर्मा द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित पत्र 'मथुरा अख़बार' में नियमित रूप लेखन। सन् 1886 में वे ‘अख़बारे चुनार' के सम्पादक बने और फिर 1888-1889 में लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक पत्र 'कोहेनूर' के सम्पादन का पदभार ग्रहण किया। सन् 1889 के अन्तिम दिनों में वे मालवीय जी के सम्पादन में कालाकांकर से निकलने वाले दैनिक पत्र 'हिन्दोस्थान' के सम्पादकीय विभाग में सम्मिलित हो गये। सन् 1893 में अमृतलाल चक्रवर्ती की प्रधानता में वे 'हिंदी बंगवासी' के सहकारी सम्पादक नियुक्त हुए और फिर 1899 में 'भारतमित्र' का सम्पादन करते हुए उन्होंने अपने कार्य क्षेत्र की पराकाष्ठा को प्राप्त किया।‘शिवशंभु के चिट्ठे' के अतिरिक्त उनके द्वारा लिखे जीवन चरित, राष्ट्रभाषा और लिपि सम्बन्धी उनके विचार, हिन्दी-उर्दू के अख़बारों का इतिहास, पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी से भाषा और व्याकरण को लेकर चले उनके ऐतिहासिक विवाद तथा उनकी स्फुट कविताओं का भी परिचय मिलता है।18 सितम्बर, सन् 1907 को 42 वर्ष की अल्पायु में स्वर्गवास।

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