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Nibandhon Ki Duniya: Pratapnarayan Mishr

by Ed. by Nirmala Jain
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350721636
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 364
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 500 grams
  • BISAC Subject(s): Essays

निबन्धों की दुनिया - प्रतापनारायण मिश्र - माना गया है कि हिन्दी गद्य और पद्य लिखने में हरिश्चन्द्र जैसे तेज़, तीख़े और बेधड़क थे, प्रतापनारायण भी वैसे ही थे। दूसरे लोग बहुत सोच-समझकर और बड़ी चेष्टा से जो ख़ूबियाँ अपने गद्य में पैदा करते थे, वह प्रतापनारायण मिश्र को सामने पड़ी मिल जाती थी। उनका सर्वाधिक मुखर साहित्यिक रूप उनके निबन्धों में ही मिलता है। इस चयन के रूप में उनके निबन्धों की दुनिया का सशक्त विशिष्ट और प्रतिनिधि रूप सामने लाया गया है। बानगी के लिए उनके कुछ निबन्धों का नाम लिया जा सकता है, जैसे 'भों', 'पौराणिक गूढ़ार्थ', 'हो ओ ओ ओ ली है', 'मुच्छ', 'बज्रमूर्ख' इत्यादि। 'मुच्छ' उनका दिलचस्प निबन्ध है।मिश्र जी की लेखनी देशदशा, समाज-सुधार, नागरी-हिन्दी-प्रचार, साधारण मनोरंजन आदि सब विषयों पर चलती थी। यद्यपि उनकी प्रवृत्ति हास्य-विनोद की ओर ही अधिक रहती थी। मिश्र जी के ऐसे अनेक निबन्ध हैं जिन्हें सामाजिक-सांस्कृतिक कहा जा सकता है। इन निबन्धों के विषय नारी, पतिव्रता, रिसवत (रिश्वत), ख़ुशामद, भेड़िया धसान, बाल्य विवाह आदि हैं। इस दृष्टि से भी उनके निबन्धों को इस चयन में स्थान मिला है। उनका एक बहुत ही दिलचस्प लेख है- 'यह तो बतलाइये'। भिगोभिगोकर मारने वाली शैली में लिखा गया है। पाठक मानेंगे कि अपनी सोच, दृष्टि, और कथ्य के साथ-साथ रवानगी से समृद्ध भाषा के कारण यह उनके महत्त्वपूर्ण निबन्धों में गिना जा सकता है। संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के शब्दों को भी मिश्र जी सहज ही आने देते थे-शर्त यह कि उनका प्रचलन जनता में हो। वस्तुतः वे भाषाओं का सम्बन्ध जन-जीवन के साथ देखना चाहते थे। पाठक पायेंगे कि उनकी भाषा एकदम प्रवाहमान यानी रवानगी से लबरेज़ है। कुल मिलाकर यह चयन प्रतापनारायण मिश्र और हिन्दी साहित्य के भारतेन्दुकालीन निबन्धों की उत्कृष्ट दुनिया का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम है। अपने समय के लेखन और चिन्तन के व्यापक फलक को अपने में समोए इस चयन को पाठक निश्चित रूप से स्वागत के योग्य पायेंगे।

निर्मला जैन (प्रधान सम्पादक) - 'निबन्धों की दुनिया' श्रृंखला की प्रधान सम्पादक निर्मला जैन हिन्दी के विशिष्ट आलोचकों में हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष रही हैं। निर्मला जैन ने बहुत-सी किताबें लिखी हैं तथा अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद और कई पुस्तकों का सम्पादन किया है। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं: रस सिद्धान्त और सौन्दर्यशास्त्र, उदात्त के विषय में (लॉगिनुस की मूल पुस्तक के अनुवाद सहित), काव्य चिन्तन की पश्चिमी परम्परा और कथाप्रसंग : यथाप्रसंग। निर्मला जैन को अनेक सम्मानों तथा पुरस्कारों से समादृत किया गया है।दिविक रमेश - दिविक रमेश हिन्दी के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित कवि हैं। बाल साहित्य के प्रमुख रचनाकार हैं। इसके साथ ही वे साहित्य के गम्भीर अध्येता और विचारक भी हैं। इनकी रचनाओं का अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। स्वयं जाने-माने अनुवादक हैं। इन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान और एनसीईआरटी के राष्ट्रीय बाल साहित्य पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। ये हांगुक विश्वविद्यालय, सोल, कोरिया में अतिथि प्रोफ़ेसर और दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय के प्राचार्य रहे हैं।प्रतापनारायण मिश्र - प्रतापनारायण मिश्र का जन्म उन्नाव ज़िले के बैजनाथ-बेथर गाँव में 24 सितम्बर, 1856 को हुआ और असमय मृत्यु 6 जुलाई, 1894 को हुई थी। साहित्यिक आयु मात्र 12 वर्ष ही मानी गयी है। इनके निबन्धों का मूल स्रोत 'ब्राह्मण' के अंक हैं। कट्टर ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद मिश्र जी भेद-भाव और पाखण्ड से दूर थे। इनके कितने ही मित्र तथाकथित निम्न समाज के थे जिनके साथ वे बिना किसी भेद-भाव के उठते-बैठते थे। उन्होंने 'प्रताप चरित्र' नाम से अपना चरित्र लिखना प्रारम्भ किया था लेकिन वह पूरा न हो सका। अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे लेकिन हिन्दी से लगाव अद्भुत था। 'ब्राह्मण' का पहला अंक 15 मार्च, 1883 ई. को निकला था जो एक 12 पृष्ठों का मासिक पत्र था। भारतीय राष्ट्रवाद की उभरती सुन्दर और सच्ची झाँकी के लिए 'ब्राह्मण' का बड़ा महत्त्व माना गया है। 'ब्राह्मण' के सम्पादन का प्रारम्भ मिश्र जी ने अपने संसाधनों के बल पर किया था। पर ग्राहकों की संख्या कभी 200 से अधिक नहीं हुई। उन्होंने गद्य और पद्य की अनेक पुस्तकें लिखीं। अनुवाद भी किया, विशेष रूप से बांग्ला की कृतियों का। नाटक-प्रहसन लिखे। 1919 ई. में मिश्र जी के कुछ लेखों का संकलन 'निबन्ध-नवनीत' नाम से प्रकाशित हुआ था। इसके अतिरिक्त उनके निबन्ध रमाकान्त त्रिपाठी द्वारा सम्पादित 'प्रताप-पीयूष' (1933), प्रेमनारायण टंडन द्वारा सम्पादित 'प्रताप- समीक्षा' और नारायणप्रसाद अरोड़ा संकलित 'प्रतापनारायण मिश्र' आदि में उपलब्ध हैं। उनकी रचनावली भी प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने धर्म और राष्ट्रीयता से सम्बद्ध निबन्धों के साथ-साथ नारी, बाल-विवाह आदि सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर भी निबन्ध लिखे हैं। साहित्यकार के रूप में उन्होंने गद्य-पद्य दोनों का ही सृजन किया है। उनकी कवित्व-शक्ति तो अद्भुत थी। भारतेन्दु की भाँति प्रतापनारायण की भाषा जन-साधारण की भाषा है। शैली की दृष्टि से उनके लेखों में विविधता और सहजता है।

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