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Ninyaanve

by Ravindra Verma
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789352292912
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 208
  • Original Price: INR 175.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): General

निन्यानवे - 'निन्यानवे' राष्ट्रीय विघटन का एक रूपक है। यह स्वातन्त्र्योत्तर समाज की क्रमिक टूटन को एक परिवार की कहानी के माध्यम से रूपायित करता है। इसका काल 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम से 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस तक है। परिवार का एक पुरखा 1857 के संग्राम में अपने पिता और परिवार को खोकर झाँसी के बाहर जंगल में घास खाता है और अगली सदी के अन्तिम दशक में उसी परिवार का एक पुत्र अपने शहर में नेता और ठेकेदार बनता है और अपने पुश्तैनी घर को बेचने की योजना बनाता है ताकि उसके निन्यानवे लाख एक करोड़ हो जायें उसे विधवा माँ की चिन्ता नहीं है।यह आत्म-केन्द्रित मध्यवर्गीय उपभोक्तावाद पर भी एक तीख़ी टिप्पणी है।इस सन्तान का नाम हरि है जिसका नाम उसके पिता उसके चाचा के नाम पर रखते हैं जो चन्द्रशेखर आज़ाद के क्रान्तिकारी दल में थे और एक बम-परीक्षण में मारे गये थे। हरि के पिता रामदयाल राष्ट्रीय आन्दोलन में कई बार जेल गये थे। आज़ादी के बाद शिक्षक रामदयाल पहले समाजवादी सपना देखते हैं, फिर अपने परिवार और समाज का टूटना। हरि का बड़ा भाई बलराम है जो एक मुस्लिम लड़की से शादी करता है और लखनऊ में रहते हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस की विडम्बनाएँ झेलता है।रामदयाल अपने बेटे हरि में जो क्रान्तिकारी भाई का सपना देखते हैं, उसकी तामीर 'निन्यानवे' की दहशत में होती है जिससे बाबरी विध्वंस की जाने की कथा जुड़ी है। यह उपन्यास इस सदी में हमारी स्वातन्त्र्योत्तर त्रासदी का आभ्यन्तरीकरण है।हिन्दी कथा-परिदृश्य में अपनी छोटी कहानियों की गहरी काव्यात्मकता और सूक्ष्म रचना-दृष्टि के लिए विख्यात लेखक की कथा-भाषा इस उपन्यास में अपने चरम विकास पर है। यह बहु-आयामी भाषा है, जो एक साथ कई स्तरों पर चलती है और मानवीय नियति से उसकी सम्पूर्णता में साक्षात करती है।

रवीन्द्र वर्मा - 1 दिसम्बर, 36 को झाँसी (उत्तर प्रदेश) में जन्म। प्रारम्भिक शिक्षा झाँसी में। प्रयाग विश्वविद्यालय से एम.ए. (इतिहास) 59 में। सन् '65 से कहानियों का प्रकाशनारम्भ। इसी दशक में क़रीब दो दर्जन कहानियाँ और एक उपन्यास 'चट्टान पर' धारावाहिक प्रकाशित। फिर तीन उपन्यास : 'किस्सा तोता सिर्फ़ तोता' (77); 'गाथा शेखचिल्ली' (81); 'माँ और अश्वत्थामा' (84)।पिछले दशक में छोटी कहानियों के नये प्रयोग चर्चित हुए, जो सिलसिला अभी भी जारी है। एक कहानी-संग्रह 'कोई अकेला नहीं है', 94 में प्रकाशित। पिछले दशक से ही कथा-आलोचना के क्षेत्र में भी सक्रिय। सन् 95 में पिछला उपन्यास 'जवाहरनगर' प्रकाशित हुआ, जो चर्चित और विवादास्पद रहा।नौकरी के सिलसिले में पहले दिल्ली, बम्बई, आगरा और लखनऊ में रहे। अब फिर डेढ़ वर्ष से अवकाश प्राप्ति के बाद दिल्ली में।

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