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Okka-Bokka

by Vinod Dubey
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788119996735
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Lokbharti Prakashan
  • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 224
  • Original Price: INR 299.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 190 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

लोकप्रिय कवि-कथाकार विनोद दूबे का उपन्यास ‘ओक्का-बोक्का’ पहली नज़र में तीन ऐसे दोस्तों की जीवन-गाथा है जो बचपन से लेकर बुढ़ापे तक दोस्ती की जादुई भावना को नए-नए सिरे से जीते हैं। सुलभ, अनवर और शरद की सदाबहार दोस्ती का ये क़िस्सा, उन्हीं तीनों में से एक शरद बयान कर रहा है, जिसने सबसे ज़्यादा दुनिया देखी है। सुलभ और अनवर अपने शहर जबलपुर में ही अपने सपनों को जीते हैं पर शरद की महत्त्वाकांक्षाओं के लिए जबलपुर बहुत छोटा है। वह सिंगापुर जाता है जहाँ वह एक बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनी में सर्वोच्च पद तक पहुँचता है। और पैसे कमाने की दौड़ में कब ताक़त के पीछे भागने लगता है, यह उसे ख़ुद पता नहीं चलता। शिखर तक पहुँचने की इस दौड़ में उसकी सहजता, पत्नी और बेटी के साथ सम्बन्ध—सब कुछ दाँव पर लग जाते हैं और वह अपने आप को अकेला और बेचैन पाता है।

ओक्का-बोक्का में इन तीनों दोस्तों के तीन दिशाओं में खुलने वाले सपने हैं। इनके निजी और सार्वजनिक संघर्ष हैं। इनके परिवार हैं पर इनमें से हर एक इसे अपने ही अन्दाज़ में जी रहा है। इसमें साधारण जीवन की असाधारणता का, उसकी मन्थर गति का, उसकी नितान्त सामान्यता का, उसके भटकावों का एक बहती हुई बोलचाल की भाषा में किया गया बयान है। इसमें किसी बहुत बड़े दार्शनिक सच के उद्घाटन के बजाय उस जीवन का उद्घाटन है जो कला या साहित्य के बारे में ज़्यादा तो नहीं जानता पर उसका विषय ज़रूर बनता रहा है। ओक्का-बोक्का की सारी गाथा एक युवा डॉक्टर वैदेही से बयान की जा रही है इसलिए बिना किसी अतिरिक्त पक्षधरता या कोशिश के दो पीढ़ियों के बीच, उनके सपनों और अन्तर्द्वन्द्वों के बीच एक तुलना भी चलती रहती है। निजी भौतिक उपलब्धियों और सामाजिक अर्थवत्ता के बीच की तनी हुई रस्सी पर लिखा गया एक पठनीय उपन्यास।

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