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Pandrah Panch Pachhattar

by Gulzar
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352291564
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 148
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 4th Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

आधुनिक उर्दू कविता में गुलज़ार शायद सबसे अधिक अननुमेय कवि हैं। उनकी काव्य यात्रा किसी पहाड़ी नदी की तरह है जिसे खुद पता नहीं होता कि उसे किन-किन वादियों से गुज़रना है, कहाँ-कहाँ झील बनानी है और किन दरख़्तों की जड़ों को सींचना है। वह अपनी धुन में आगे बढ़ती जाती है और हर कदम पर एक नया, पहले से ख़ूबसूरत और ज्यादा दिलचस्प लैंडस्केप छोड़ जाती है। इस घुमावदार और रोमांचक सफर में जो एक रंगत गुलज़ार की शाइरी का साथ कभी नहीं छोड़ती, वह है अपने आसपास से एक जज़्बाती रिश्ता । यह आसपास इतना विस्तृत है कि इसके दायरे में पेड़-पौधों, नदी-झरनों और इनसानी दुःखान्तों और मनोहरताओं से लेकर पूरी कायनात आ जाती है। दूसरी तरफ, इस मज़बूत रिश्ते में इतना खलूस है कि यथार्थ का हर पहलू कवि को अपना लगने लगता है। लेकिन जो चीजें उनके मुलायम मिज़ाज से मेल नहीं खातीं या जो यथार्थ इतना विकृत कर दिया गया है कि वह अयथार्थ में तब्दील हो गया है, उसके साथ भी वे पंजा नहीं लड़ाते, बल्कि अपने ख़ास हक़ीक़ी अन्दाज़ में उसकी पीठ पर हल्के से अपने नाखून गड़ा देते हैं।पन्द्रह पाँच पचहत्तर की कविताएँ पन्द्रह खण्डों में विभाजित हैं और हर खण्ड में पाँच कविताएँ हैं । गुलज़ार का यह पहला संग्रह है, जिसमें मानवीयकरण का इतना व्यापक प्रयोग किया गया है । यहाँ हर चीज़ बोलती है-आसमान की कनपट्टियाँ पकने लगती हैं, काल माई खुदा को नीले रंग के, गोल-से इक सय्यारे पर छोड़ देती है, धूप का टुकड़ा लॉन में सहमे हुए एक परिन्दे की तरह बैठ जाता है... यहाँ तक कि मुझे मेरा जिस्म छोड़कर बह गया नदी में । यह कोई उक्ति-वैचित्र्य नहीं, बल्कि वास्तविकता का बयान करने की एक नयी, आत्मीय शैली है। यह वास्तविकता भी कुछ नयी-नयी-सी है, जिसकी हर परत से एक कोमल उदासी बाविस्ता है। यह उदासी जहाँ हमारे युगबोध को एक तीखी धार देती है, वहीं उसकी कोमलता की लय ज़िन्दगी को जीने लायक बनाती है। कुल मिलाकर, पचहत्तर नज़्मों में बिखरा हुआ यह महाकाव्य हमारी अपनी जिन्दगी और हमारे अपने परिवेश की एक ऐसी इंस्पेक्शन रिपोर्ट है जिसका मजमून गुलज़ार जैसा संवेदनशील और खानाबदोश शायर ही कलमबन्द कर सकता था।

गुलज़ार -असाधारण और बहुआयामी प्रतिभा के धनी गुलज़ार श्रेष्ठता और लोकप्रियता, दोनों ही कसौटियों पर सफल एक ऐसे फ़नकार हैं जो विभिन्न कला माध्यमों में काम करने के साथ-साथ अभिव्यक्ति के अपने माध्यम की खोज भी करते रहे हैं। वे एक मशहूर शायर, अप्रतिम फिल्मकार, संजीदा कहानी लेखक एवं बेहतरीन गीतकार हैं। साथ ही, वे एक मँजे हुए संवाद और पटकथा लेखक भी हैं।18 अगस्त 1934 को झेलम ज़िले (अब पाकिस्तान में) के दीना गाँव में जन्मे गुलज़ार ने बिमल रॉय और हृषीकेश मुखर्जी की छाया में अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू किया । गीतकार के रूप में उन्होंने सचिन देव बर्मन के लिए 'बन्दिनी' फ़िल्म के पहली बार गीत लिखे । गुलज़ार ने खुशबू, आँधी (आपातकाल के दौरान प्रतिबन्धित), लिबास, मौसम, मीरा, परिचय, अंगूर, माचिस और हू तू तू जैसी मौलिक फ़िल्मों के निर्देशन के अलावा मिर्ज़ा ग़ालिब पर एक उत्कृष्ट टीवी सीरियल भी बनाया है।गुलज़ार की कविताएँ - जानम, एक बूँद चाँद, कुछ और नज़्में, साइलेंसेज़, पुखराज, ऑटम मून, त्रिवेणी, रात, चाँद और मैं, रात पश्मीने की, यार जुलाहे... आदि पुस्तकों में संकलित हैं । कहानियों के महत्त्वपूर्ण संग्रह हैं - चौरस रात और धुआँ । रावी पार में गुलज़ार ने बिमल रॉय के संस्मरण लिखे हैं। उन्होंने बच्चों के लिए कुछ बेहद अच्छी रचनाएँ भी की हैं।'पद्म भूषण', 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार', 'दादासाहब फाल्के सम्मान', 'ग्रैमी पुरस्कार', 'ऑस्कर अवार्ड' तथा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज, शिमला के प्रतिष्ठित 'लाइफ टाइम अचीवमेंट फ़ेलोशिप' सहित दर्जनों अलंकरणों से सम्मानित गुलज़ार को बीस बार 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' एवं सात बार 'नेशनल अवार्ड' मिल चुका है। वे मुम्बई में रहते हैं और फ़िल्मों के लिए गीत, संवाद एवं पटकथा लिखते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण कवियों का अनुवाद कर रहे हैं।

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