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Parivarik Jeevan Ke Vyangya

by Giriraj Sharan Agrawal
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788173151538
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 144
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

पारिवारिक जीवन के व्यंग्यहमारे परिचितों में भाँति-भाँति के लोग हैं। पारिवारिक जीवन के बारे में इन सबके अनुभव भी अलग-अलग हैं। इन सबकी भीड़ में एक सज्जन हैं, वे प्राय: कहा करते हैं कि पारिवारिक जीवन तो बृज के लड्डुओं जैसा होता है, जो खाए वह भी पछताए और जो न खाए वह भी पछताए। हम यह बात पूरे विश्वास से तो नहीं कह सकते कि दोनों स्थितियों में पछतानेवाली बात क्यों है, फिर भी लगता है, हमारे मित्र की बात में कुछ-न-कुछ सच्चाई अवश्य है। क्योंकि बूर के लड्डुओं में लागत अधिक आती है, आनंद कम; बृज के लड्डुओं की एक विशेषता और भी है, वे जरा-सी ठेस लगते ही बिखर जाते हैं; जैसे परिवार को कोई हलका-भारी झटका तोड़ देता है या बिखेर देता है।हमारे मित्र का एक विचार यह था कि जो परिवर्तनशील नहीं है, वह परिवार के योग्य नहीं है। परिवार के लिए आदमी का गतिशील अथवा प्रगतिशील होना इतना आवश्यक नहीं है, जितना परिवर्तनशील होना आवश्यक है।जो भी हो, यह तो हमारे मित्र का विचार है। जरूरी नहीं कि सब आदमी इससे सहमत हों। पर जहाँ तक अपना सवाल है, परिवार के विषय में हमारा अनुभव कुछ ‘यों ही-सा’ है। इसमें दोष हमारा है या हमारे परिवार का, यह तो हम नहीं कह सकते, लेकिन अपने मित्र की इस बात पर कि ‘पारिवारिक जीवन तो बूर के लड्डुओं जैसा होता है, जो खाए वह भी पछताए और जो न खाए वह भी पछताए’, हम सोचते हैं कि क्यों न इसपर एक अदद रिसर्च कर डालें; ताकि आप जैसे बहुत-सों का भला हो।परिवार में खटकते बरतनों और बजते रिश्तों पर खट्टी-मीठी चोट करते हुए ये व्यंग्य आपके लिए प्रस्तुत हैं।

डॉ. गिरिराजशरण अग्रवालजन्म : 14 जुलाई, 1944 को संभल (मुरादाबाद) उ.प्र. में।शिक्षा : एम.ए., पी-एच.डी. (हिंदी), आगरा विश्‍वविद्यालय।प्रधान संपादक ‘शोध दिशा’ (त्रैमासिक); सचिव, हिंदी साहित्य निकेतन; पूर्व मंडलाध्यक्ष, रोटरी अंतरराष्‍ट्रीय मंडल 3100; सदस्य, भारतीय हिंदी परिषद् इलाहाबाद; सदस्य, अखिल भारतीय हिंदी प्रकाशक संघ, दिल्ली। कृतित्व : हिंदी में मौलिक एवं संपादित शताधिक पुस्तकें प्रकाशित।पुरस्कार-सम्मान : उ.प्र. युवा साहित्यकार संघ द्वारा ‘सरस्वतीश्री’; तुलसी पीठ कासगंज द्वारा ‘विद्यावारिधि’; विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ गांधीनगर द्वारा ‘विद्यासागर’; ‘बाबू झोलानाथ’ कृति पर उ.प्र. हिंदी संस्थान का अनुशंसा पुरस्कार; श्रीमती रतन शर्मा बाल साहित्य पुरस्कार; ‘मानवाधिकार : दशा और दिशा’ पुस्तक पर राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली का प्रथम पुरस्कार; ‘राजनीति में गिरगिटवाद’ पर उ.प्र. हिंदी संस्थान का अनुशंसा पुरस्कार, ‘आओ अतीत में चलें’ पर सूर-पुरस्कार एवं ‘साहित्यभूषण’; केंद्रीय हिंदी निदेशालय का ‘शिक्षा पुरस्कार’।

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