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Partain

by Lakshmi Kannan
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170554936
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 188
  • Original Price: INR 150.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

परतें - तमिल और अंग्रेज़ी में समान रूप से रचनारत संवेदनशील लक्ष्मी कण्णन् की हर कहानी एक अनूठा रंग, एक अनोखी पहचान लिए हुए होती है। उनकी कहानियाँ अन्तश्चेतना की हर परत को छूती हुई पाठकों को बाध्य करती हैं कि वे अपने ऊपर ओढ़ी हुई परतों को एक-एक कर उतार कर अपने 'स्व' के प्रत्यक्ष खड़े हो जायें। स्वयं लेखिका की यह खोज अत्यन्त छटपटाहट व व्याकुलता से भरी हुई है।इस संग्रह की कहानियों में एक ओर जहाँ 'गहराता शून्यबोध' का नायक अपने स्थायी और अस्थायी अस्तित्व के मध्य झूलता हुआ अपने आपको दफ़्तर की फाइलों या मेज़-कुर्सी की दरारों में से झाँक रहे दीमक के कीड़े से अधिक नहीं मानता, वहीं दूसरी ओर 'सव्यसाची का चौराहा' का वह वृद्ध अंग्रेज़ भारतीय दर्शन को साकार करता हुआ मानवीय अस्तित्व को एक चरम बिन्दु पर ला देता है।लक्ष्मी कण्णन् की हर कहानी में समसामयिक प्रश्नों के साथ-साथ एक खोज की साध है, एक एकाकीपन, जिसमें जीते हुए पात्र अपने 'स्व' की तलाश में प्रयत्नशील हैं। जहाँ इन रचनाओं में ऐसे गम्भीर स्वरों का आलोड़न है, वहीं दूसरी ओर 'कस्तूरी' और 'हर सिंगार' की भीनी-भीनी महक द्वारा मानव-मन की गहराइयों तक पहुँचने का सफल प्रयास भी किया गया है।अन्तिम पृष्ठ आवरण - वह शरीर उस सफ़ेद कपड़े में लिपटा इस तरह लग रहा था मानों साँचे में ढाल दिया गया हो। सिर गोलाकार नज़र आ रहा था। चेहरा थोड़ा उठा हुआ। कन्धे, धड़, लम्बी टाँगें और ऊपर की ओर किये हुए पैर। मानो वह उड़ने को तैयार है और अब वह उड़ चुका। सब कुछ ख़त्म हो गया। अब बैठकर छाती फाड़-फाड़कर रोने के लिए समय ही समय है, जैसे यह जनसमूह बिलख रहा है...उस जनसमूह में से निकलकर वह उस खिड़की की तरफ़ दौड़ा, जहाँ चन्द्रा लेटी थी। वह हमेशा की तरह बिना हिले-डुले पड़ी थी। रामचन्द्रन की आँखें भर आयी थीं और गला सूखने लगा था। उसकी जीभ तालू से सट गयी थी। चन्द्रा क्या तुम भी मर...। चन्द्रा मेरी प्राण, मत जाओ। थोड़ा और सहन कर लो...। मुझे माफ़ कर दो। अपने घटिया विचारों के लिए मुझे बड़ा दुःख है। मैं बड़ा शर्मिन्दा हूँ। आशा और तुम्हारे माता-पिता की मैं अच्छी तरह देखभाल करूँगा। मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ। बस तुम मुझे छोड़कर मत जाना..

लक्ष्मी कण्णन् - तमिल में काबेरी के नाम से लेखन। कविता, कहानी, उपन्यास तीनों विधाओं में इनकी समान गति है। अंग्रेज़ी में एम.ए. और अत्याधुनिक 'सॉलबेलो' पर पीएच. डी. की है। हिन्दी में 'लय' के बाद यह दूसरा संग्रह प्रकाशित। तमिल में 'रिद्म', 'पारिजाता' और 'इंडिया गेट' कहानी संग्रह प्रकाशित। जिनका अंग्रेज़ी में अनुवाद स्वयं लेखिका ने किया। अंग्रेज़ी में 'एक्जाइल्ड गॉड्स', 'द ग्लो एंड द ग्रे' और 'इंप्रेशंस' कविता संग्रह प्रकाशित। 'थ्रो द. वेल्स' और 'वुडन काऊ' शीर्षक से दो उपन्यास अंग्रेज़ी में अनूदित। तमिल में तीन अन्य कहानी संग्रह - 'इनरू मलाई, इन्नुदन वेनिमल पोर्थियामु', 'अथुक्कु पोग्नम्' और 'ओसाईगल' प्रकाशित।भाषा की समृद्ध परम्परा की पहचान रखनेवाली लक्ष्मी कण्णन् अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका रही हैं। कई पुस्तकों का अनुवाद किया है। समाजशास्त्रीय और स्त्रीपरक विषयों पर अनेक विचारपूर्ण लेख लिखे हैं।

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