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Praja Ka Amurtan

by Prabhakar Shrotriya
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181435446
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 119
  • Original Price: INR 150.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

प्रजा का अमूर्तन - प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा लिखे गये 'नया ज्ञानोदय' के सम्पादकीय आलेखों का यह संकलन सम्पादन के क्रम में लिखी गयी औपचारिक टिप्पणियों से कहीं अधिक लेखक की बेचैनियों की रचनात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं। अपने सम्पादकीय दायित्व का निर्वाह करते हुए श्रोत्रिय जी ने अपनी सजग दृष्टि और तरल संवेदना के मेल से मर्मस्पर्शी गद्य रचा है, जैसा कि उन्होंने ख़ुद कहा है, "समय के गतिशील प्रश्नों, भयों, चिन्ताओं, घटनाओं, उपलब्धियों में से किसी सार्थक सामयिक विषय का चयन किया और उसे 'लेखक' को सौंप दिया। लेखक ने सूचना और इतिवृत्त से निकाल कर उसे रचना का घर दिया, जहाँ अन्तर्वृत्ति, चेतना, संवेद, सरोकार, सन्दर्भ, मनन, विश्लेषण, भाषा, शिल्प, रंग-छटाओं से उसे पोषण और शायद लावण्य भी मिला-यानी जो भी लेखक के घर में रचना के सम्भव उपादान और आत्मीय संसार था, वही सब सम्पादक ने पाठक को दिया।"इस तरह ये सम्पादकीय सदैव अपने पाठकों के प्रति गहन आत्मीय संवेदना से उन्मुख रहे हैं, क्योंकि इनके लेखक के लिए अपने पाठक से संवाद करना उसकी पहली जरूरत रही है। वस्तुतः लेखक ने इन आलेखों को लिखते वक्त अपनी बौद्धिक प्रखरता और अभिज्ञता को पन्नों पर उतार देने भर को अपने दायित्व की पूर्ति नहीं माना है, बल्कि सम्प्रेषण की सामर्थ्य को रचना का जीवन मानकर पाठक के पक्ष का हमेशा ध्यान रखा है।तमाम तरह के विषयों और प्रसंगों पर लिखते वक़्त भी लेखक ने जिसे हमेशा याद रखा, वह है साधारणजन। यह साधारणजन उसके लिए कसौटी की तरह है, जिसके सन्दर्भ में वह देश-दुनिया के तमाम उतार-चढ़ावों की पड़ताल करता है। लेखक का यह दृष्टिकोण ही इस संकलन का आधार है और यही इसकी प्रासंगिकता को भी सिद्ध करता है।

प्रभाकर श्रोत्रिय - प्रतिष्ठित आलोचक, सम्पादक, नाटककारजन्म : 1988, जावरा (म.प्र.)।शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., डी.लिट्. पैंतीस पुस्तकें प्रकाशित, जिनमें दो दर्जन मौलिक तथा एक दर्जन सम्पादित ग्रन्थ।प्रमुख कृतियाँ : कविता की तीसरी आँख, कालयात्री है कविता, रचना एक यातना है, अतीत के हंस मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता, मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, कवि-परम्परा : तुलसी से त्रिलोचन (आलोचना), सौन्दर्य का तात्पर्य, समय का विवेक, समय समाज साहित्य, सर्जना का अग्निपथ, प्रजा का अमूर्तन, बाज़ारवाद में हिन्दी, समय में विचार, हिन्दी कल आज और कल (निबन्ध), इला, साँच कहूँ तो, फिर से जहाँपनाह, तीन नाटक (नाटक), अनुष्टुप, हिन्दी कविता की प्रगतिशील भूमिका, प्रेमचन्द : आज (सम्पादित)।मूल्यांकन-पुस्तकें : प्रभाकर श्रोत्रिय : आलोचना की तीसरी परम्परा- सम्पादक : डॉ. उर्मिला शिरीष, इला और प्रभाकर श्रोत्रिय के नाटक-सम्पादक : विभु कुमार।पुरस्कार : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी पुरस्कार, रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार, श्री शारदा सम्मान, साहित्य भूषण, दीनदयाल उपाध्याय सम्मान (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान) आदि। के.के. बिड़ला फ़ाउंडेशन की फेलोशिप विदेश यात्राएँ।पूर्व में : निदेशक भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली; निदेशक भारतीय भाषा परिषद कोलकाता; हिन्दी प्राध्यापक सम्पादक साक्षात्कार, अक्षरा, वागर्थ, नया ज्ञानोदय।

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