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Pravasi Putra

by Dr. Padmesh Gupta
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789352295302
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 148
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

हिन्दी भारत की भाषा है लेकिन केवल भारत की नहीं पिछले कुछ समय से वह दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में फैलती गयी है और यह विस्तार आज भी जारी है। लन्दन में हिन्दीवासी बड़ी संख्या में हैं और हिन्दी बोलते भी हैं। यद्यपि अंग्रेज़ी का वर्चस्व थोड़ा बढ़ा है पर पिछले अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि कुछ क्षेत्रों में खासतौर से यू.के. हिन्दी समिति व वातायन के प्रयास से हिन्दी न सिर्फ़ बढ़ी है बल्कि अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनी है। गोष्ठियाँ होती हैं, पत्रिकाएँ निकलती हैं और ये सब कुछ जिस एक व्यक्ति का प्रयास है उसे मैं सीधे-सीधे उसके नाम से याद करूँगा 'श्री पद्मेश गुप्त' । वे मूलतः लखनवी हैं। उनके वयोवृद्ध पिता दाऊजी मेरे आज भी अच्छे मित्र हैं।यह जानकर मुझे विशेष प्रसन्नता हुई कि पद्मश का नया कविता संग्रह आ रहा है। संग्रह के साथ की भूमिका से संग्रह की सभी कविताओं और पद्मश के कविता कहने की कला की जानकारी तो मिल ही जायेगी पर अपनी ओर से यह कहूँगा कि यह कृति एक अभिनव प्रयास है और पद्मेश की अन्य रचनाओं से आगे बढ़ी हुई है। इससे पहले उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं पर यह तीसरा संग्रह थोड़ा अलग ही दिखाई पड़ता है और पहले से कुछ और भी महत्त्वपूर्ण। मैं पूरा संग्रह तो नहीं देख सका हूँ लेकिन एक कविता पर मेरी दृष्टि पड़ी, जो बेटे को निवेदित है। जो आज की भाषा में है और जिसका सन्देश भी ठेठ आज का है।'पचिह्न-पुत्र प्रंकित को'चलते चलते बाज़ार में किसी ने मेरी अँगुलियाँ थामीं मैं खिलौनों की दुकान की ओर बढ़ गया क्षण भर में भ्रम टूटा, और मैंने पाया... मेरी हथेली को स्पर्श करने वाला... सिर्फ़ एक हवा का झोंका था। फिर कैसे ?मुझे अपने पदचिह्नों के साथ... कुछ नन्हे पाँव के निशान भी दिखायी दिये और सूर्यास्त सी मुस्कान के साथ मैं स्वयं...खिलौनों का बाज़ार हो गया। कविताएँ दूसरी भी महत्त्वपूर्ण हैं पर इस अच्छी कविता के साथ मैं अपनी बात साधुवाद के साथ समाप्त करता हूँ और प्रियवर पद्मेश को हार्दिक बधाई देता हूँ।- केदारनाथ सिंह

डॉ. पद्मेश गुप्त -पद्मेश अब तक ब्रिटेन में विश्व एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हुए चार सम्मेलनों, लन्दन में 20 अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों, 1999 में यू.के. में हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के संयोजक, सैकड़ों साहित्यिक गोष्ठियों, अध्यापकों के अधिवेशन एवं शिविर तथा हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के संयोजन का दायित्व निभा चुके हैं।आपने यू.के. में हिन्दी की एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'पुरवाई' का 18 वर्षों तक सम्पादन एवं प्रकाशन किया तथा 'प्रवासी टुडे' पत्रिका का 8 वर्षों तक सम्पादन किया।2017 में पद्मेश गुप्त ने भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के कर-कमलों द्वारा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, मानव संसाधन विकास मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार ग्रहण किया।सम्प्रति : Oxford Business College, 65 George Street, Oxford OX1 2BQ

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