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Purvaiyan

by Padmesh Gupta
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789371120531
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 308
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 500 grams
  • BISAC Subject(s): Journalism

ब्रिटेन में ‘पुरवाई' का जन्म और यात्रा विश्व में हिन्दी की यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। प्रवासी साहित्य ने एक विषय के रूप में विकसित होकर विश्व में विशेषकर भारत के अकादमिक जगत में अपना स्थान बनाया। 'पुरवाई' उसका प्रस्थान बिन्दु भी है।'पुरवाई' हिन्दी का एक विशिष्ट अभियान थी। यह एक व्यक्ति का रचनाकर्म नहीं था। उच्च रचनात्मक प्रतिभाओं का सामूहिक यज्ञ था जिसके पुरुषार्थ से प्रभावी और ओजस्वी वातावरण का निर्माण होना था। ब्रिटेन से डॉ. उषा राजे सक्सेना, दिव्या माथुर, तेजेन्द्र शर्मा, प्राण शर्मा, डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. गौतम सचदेव, डॉ. के.के. श्रीवास्तव, भारत से कमलेश्वर, डॉ. कन्हैयालाल नन्दन, डॉ. कमल किशोर गोयनका, डॉ. अशोक चक्रधर जैसे लोगों के योगदान के कारण 'पुरवाई' का यश दुनिया में फैलता गया और वह प्रवासी दुनिया की प्रमुख पत्रिका के रूप में उभरी।'पुरवाई' एक दीर्घकालिक यज्ञ था। लेखन एक प्रकार का दस्तावेज़ीकरण होता है और अपने समय और परिस्थिति को मापने का पैमाना होता है। हमें उससे 90 के दशक के उत्साह, ऊर्जा और पहल की जानकारी मिलती है। परन्तु डॉ. सिंघवी के समय ब्रिटेन में हिन्दी जागरण का कार्य हुआ और ब्रिटेन में हिन्दी की लहर चल पड़ी।इस पुस्तक लेखन में महत्त्वपूर्ण बात घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि वह दृष्टि है जो अपने विवेकपूर्ण सोच से पाठकों को वैकल्पिक परिदृश्य और सोचने की दिशा देती है। कान्धार विमान अपहरण काण्ड पर 'पुरवाई' जनवरी 2000 के सम्पादकीय में पदमेश गुप्त लिखते हैं— “आतंकवाद की कालिमा में डूबी उस सदी की अन्तिम रात को ढकती हुई इस सदी की खिसियाती हुई पहली सुबह लिए कलंकित प्रकाश। यदि यात्रियों का एक भी शहीद भगत सिंह की माँ के शब्द दोहरा देता कि देश पर मर-मिटने के लिए भगवान ने मुझे और बेटे क्यों नहीं दिये और अन्याय तथा असत्य के विरुद्ध देश के ऐसे हज़ारों वासी बलिदान के लिए उपलब्ध हैं तो कहाँ के रह जाते वे अपहरणकर्ता।" ऐसे ही विचार, सूत्र और दृष्टि हमें उस समय के सम्पादकीयों और स्तम्भ-लेखन में दृष्टिगोचर होती है। उनकी सूझबूझ, अनुभव, व्यापक फलक उनके लेखन में दिखाई देता है।हिन्दी की वैश्विकता के प्रमुख व्यक्तित्व होने के चलते इस पुस्तक का महत्त्व इसलिए भी है कि इसमें हिन्दी की विश्व यात्रा का, विश्व हिन्दी सम्मेलनों का उल्लेख और आकलन है। एक तरह से यह उचित ही है क्योंकि डॉ. दाऊजी गुप्त जब तक जीवित रहे, विभिन्न विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भागीदारी करते रहे। पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन वर्ष 1975 से लेकर मॉरीशस में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन तक आदरणीय दाऊजी सदा उपस्थित रहे। डॉ. पद्मेश गुप्त विश्व हिन्दी सम्मेलनों के परिदृश्य से वर्ष 1999 में जुड़े। वर्ष 2002 में सूरीनाम में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में भी वे अत्यन्त सक्रिय रहे।यह पुस्तक इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, कमलेश्वर, कन्हैयालाल नन्दन, डॉ. दाऊजी गुप्त, डॉ. गौतम सचदेव, सोहन राही, डॉ. सुरेन्द्र अरोड़ा जैसे व्यक्तित्वों के संस्मरण हैं। इन लेखों से उन नामचीन व्यक्तित्वों के बारे में जानकारी प्राप्त होती ही है, उनके व्यक्तित्व की परतें खुलती हैं, उस समय और परिस्थितियों में उनके हस्तक्षेप और दृष्टि का पता चलता है। उन्हें जानना हिन्दी के वैश्विक रंग को जानना है, वैश्विक हिन्दी साहित्य में उनके अवदान को समझना है। —भूमिका से

पद्मेश गुप्त का जन्म 5 जनवरी 1965 को लखनऊ के समाजसेवी एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था।आपने लामर्टिनियर कॉलेज, क्रिश्चियन कॉलेज एवं लखनऊ विश्वविद्यालय से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त इन्स्टीट्यूट ऑफ़ रूर बैतराँ ड्यूपॉँ, फ्रांस में केमिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन तथा कॉस्मेटिक इंडस्ट्रीज़ पर शोध किया। उसके उपरान्त पदमेश ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से साहित्यरत्न, एम.बी.ए. एवं इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में पीएच. डी. की उपाधि ग्रहण की। पद्मेश गुप्त अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू एवं फ्रेंच भाषाओं के जानकार हैं।1990 में पद्मेश ने लन्दन में यू.के. हिन्दी समिति की स्थापना की तथा 5 वर्षों तक हिन्दी पत्र का सम्पादन एवं प्रकाशन किया। आप 1993 में मैनचेस्टर में हुए अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के दो सत्रों हेतु सह-अध्यक्ष चुने गये। 1993 से 2013 तक प्रतिवर्ष लन्दन में होने वाले अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी कवि सम्मेलनों का संयोजन करते रहे हैं। 2001 से 2014 तक पूरे ब्रिटेन एवं यूरोप में होने वाली हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के संयोजन का भार भी पद्मेश निभाते रहे। सन् 2003 से हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के 9 विजेताओं को हिन्दी समिति भारत भ्रमण पर ले जाती है।पद्मेश अब तक ब्रिटेन में विश्व एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हुए चार सम्मेलनों, लन्दन में 20 अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों, 1999 में यू.के. में हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के संयोजक, सैकड़ों साहित्यिक गोष्ठियों, अध्यापकों के अधिवेशन एवं शिविर तथा हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिताओं के संयोजन का दायित्व निभा चुके हैं।पद्मेश गुप्त के वक्तव्य एवं लेख, ब्रिटेन एवं भारत के अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपने लन्दन में टेलीविज़न चैनल पर, हिन्दी कविता पर 'वह, क्या बात है' सीरीज़ का कई महीनों तक संचालन किया। विश्व में मास्को, पोलैंड, बुदापेस्ट, बुकारेस्ट जैसे अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में व्याख्यान के अलावा आपने 2010 में दिल्ली में हुए प्रवासी फ़िल्म महोत्सव के अन्तरराष्ट्रीय संयोजक का दायित्व भी निभाया।पद्मेश गुप्त राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मानों से विभूषित हो चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं, 1997 में 'ताज महोत्सव', 2000 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा विदेशों में हिन्दी प्रचार, प्रवासी भारतीय दिवस 2003 में ‘अक्षरम’, दिल्ली एवं सन् 2007 में न्यूयॉर्क में हुए आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भारत सरकार द्वारा 'विश्व हिन्दी सम्मान'। 2017 में पद्मेश गुप्त ने भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के कर-कमलों द्वारा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा 'पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार' ग्रहण किया। 2024 में मॉरीशस के प्रधानमंत्री द्वारा 'विश्वरंग सम्मान' प्राप्त किया।आपने यू.के. में हिन्दी की एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'पुरवाई' का 18 वर्षों तक सम्पादन एवं प्रकाशन किया तथा 'प्रवासी टुडे' पत्रिका का 8 वर्षों तक सम्पादन किया। कोविड काल से आरम्भ अब तक यू. के. की संस्था वातायन एवं वैश्विक हिन्दी परिवार के साप्ताहिक वर्चुअल ज़ूम संगोष्ठियों का संयोजन कर रहे हैं।पद्मेश गुप्त 2007 से ऑक्सफोर्ड में ऑक्सफोर्ड बिज़नेस कॉलेज के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। अब तक पद्मेश के तीन काव्य-संग्रह ‘आकृति’, ‘सागर का पंछी’ एवं ‘प्रवासी पुत्र’, यू.के. के हिन्दी कवियों का संग्रह ‘दूर बाग़ में सोंधी मिट्टी’ तथा कहानी—ंग्रह 'डेड एंड’ प्रकाशित हो चुके हैं।

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