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Rahul Gandhi: Neta Mohabbat Wala

by Mukesh Bhardwaj
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789362879684
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Yatra Books - Vani Prakashan Group
  • Publisher Imprint: Yatra Books - Vani Prakashan Group
  • Publication Date:
  • Pages: 208
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): Journalism

यह किताब क्यों ?भारत के 75 साल के जवां लोकतन्त्र के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव इसलिए अहम है क्योंकि 2014 में प्रचंड बहुमत की सरकार ने 2019 में विमर्श दिया कि उसका कोई विकल्प नहीं हो सकता है । गठबन्धन सरकार को भारतीय लोकतन्त्र का सबसे बड़ा खलनायक बना कर उसका मर्सिया पढ़ दिया गया। इसके साथ ही बजरिए राहुल गांधी विपक्ष की पूरी अवधारणा को ही खारिज किया गया । राजनीति में दस साल का समय बहुत लम्बा नहीं तो बहुत छोटा भी नहीं होता है। इस समावेशी समय में ही जनता ने प्रचंड बहुमत वाली सरकार की अति के अन्त का सन्देश दे दिया। राहुल गांधी की अगुआई में मोदी सरकार को राजगर सरकार बना दिया। इसके साथ ही जनता ने उस नेता की न्याय यात्रा को पूरा न्याय दिया जिन्हें भाजपा की सरकार और उससे जुड़े प्रचार ने 'पप्पू' साबित कर दिया। दलबदल करने वाले नेताओं को हार का सन्देश देते हुए नफरती भाषणों को नमस्ते कह कर नेता मोहब्बत वाला को विपक्ष का नेता बना दिया। जब नेता लोकतन्त्र की राजनीति भूल जाते हैं तो जनता उसे लोकतन्त्र की पाठशाला में वापस ले ही आती है । जनता की पाठशाला से पास हुए राहुल गांधी के साथ भारतीय लोकतन्त्र के दस साला सफ़र को समझने की कोशिश में यह किताब अब आपके हवाले ।

मुकेश भारद्वाज -इंडियन एक्सप्रेस समूह में पत्रकारिता की शुरुआत कर हिन्दी दैनिक 'जनसत्ता' के कार्यकारी सम्पादक तक का सफ़र। ‘इंडियन एक्सप्रेस' व 'जनसत्ता' में अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों भाषा में काम किया । लेकिन ‘जनसत्ता' की कमान सँभालने के बाद महसूस हुआ कि जब हम जन की भाषा में पत्रकारिता करते हैं तो उस समाज और संस्कृति का हिस्सा होते हैं जिससे हमारा नाभिनाल सम्बन्ध है पिछले कुछ समय से समाज और राजनीति के नये ककहरे से जूझने की जद्दोजहद जारी है। संचार के नये साधनों ने पुरानी दुनिया का ढाँचा ही बदल दिया है। स्थानीय और स्थायी जैसा कुछ भी नहीं रहा । एक तरफ़ राज्य का संस्थागत ढाँचा बाज़ार के खम्भों पर नया-नया की चीख़ मचाये हुए है तो चेतना के स्तर पर नया मनुष्य पुराना होने की जिद पाले बैठा है। राजनीति वह शय है जो भूगोल, संस्कृति के साथ आबोहवा बदल रही है। लेकिन हर कोई एक-दूसरे से कह रहा कि राजनीति मत करो। जब एक विषाणु ने पूरी दुनिया पर हमला किया तो लगा इन्सान बदल जायेगा, लेकिन इन्सान तो वही रहा और पूरी दुनिया की राजनीति लोकतन्त्र से तानाशाही में बदलने लगी। राजनीति के इसी सामाजिक, भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक यथार्थ को 'जनसत्ता' में अपने स्तम्भ 'बेबाक बोल' के ज़रिये समझने की कोशिश की जिसने हिन्दी पट्टी में एक ख़ास पहचान बनायी। ‘बेबाक बोल' के सभी लेख एक समय बाद किताब के रूप में पाठकों के हाथ में होते हैं । इसके बाद प्रेम और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में नये युग की अपराध-कथा कहता उपन्यास नक़्क़ाश।

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