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Ram Vangaman Path Kee Vanaspatiyan

by Dr. Mahendra Pratap Singh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789387648203
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 204
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 600 grams
  • BISAC Subject(s): Sociology / General

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि यदि भारत के जनमानस के अन्तर्मन में कोई विचार स्थापित करना हो तो उसे धर्म से जोड़ देना चाहिए। राम और कृष्ण भारत के सर्वमान्य महापुरुष हैं तथा रामायण एवं महाभारत की कहानियाँ विद्वान से अनपढ़ तक सभी वर्ग में लोकप्रिय हैं। राम वनगमन एक सर्वमान्य घटना है। अनेक स्थानों पर इसके साक्ष्य विद्यमान हैं। आजकल तो रामेश्वरम् से श्रीलंका तक के सेतु के प्रमाण भी मिल रहे हैं। यदि हम राम वनगमन पथ को प्राचीन रूप में विकसित करने का प्रयास करें तो इसे जनता का पूरा सहयोग प्राप्त होगा तथा हम अपनी पौराणिक धरोहर को संरक्षित करने का अभूतपूर्व कार्य भी कर सकेंगे।वाल्मीकि रामायण या तुलसीकृत रामचरितमानस में राम वनगमन पथ का पूर्ण उल्लेख नहीं है। मोटे रूप में अयोध्या से प्रयाग, प्रयाग से चित्रकूट, चित्रकूट से पंचवटी, पंचवटी से किष्किन्धा और वहाँ से रामेश्वरम् फिर श्रीलंका का उल्लेख आता है। बीच-बीच में पड़ने वाले पर्वतों एवं नदियों के उल्लेख से मार्ग का अनुमान लगाया जा सकता है। पूर्ण रूप से राम वनगमन पथ की खोज हेतु अभी शोध की आवश्यकता है।इस कृति में राम वनगमन पथ में वर्णित वृक्ष प्रजातियों पर विचार किया गया है। ऋषि वाल्मीकि राम के समकालीन थे इसलिए वाल्मीकि रामायण में वर्णित प्रजातियों को आधार माना गया है। तुलसीकृत रामचरितमानस की लोकप्रियता को देखते हुए उसमें वर्णित प्रजातियों को भी संज्ञान में लिया गया है।

डॉ. महेन्द्र प्रताप सिंह, जन्म : 21 दिसम्बर 1960 । शिक्षा : एम. एससी. (गणित)। प्रकाशित कृतियाँ : भारतीय वन उपज, भारत के संरक्षित वन, वाल्मीकि की पर्यावरण चेतना (भाग-1, वनस्पतियाँ), वाल्मीकि की पर्यावरण चेतना (भाग-2, पर्वत एवं नदियाँ), वाल्मीकि की पर्यावरण चेतना (भाग-3, जीव जन्तु), मानस में प्रकृति विषयक सन्दर्भ, नारद की भू-यात्रा, अभिव्यक्ति, वन और मन, प्रायश्चित्त, गाँधी और कृष्ण, गीता और कबीर, नारी, जिजीविषा, प्रेम-पथ, तुलसी की अन्तर्दृष्टि, पांचाली।। सम्पादन : श्री रवि गोंड के साथ 'समकालीन विमर्श : मुद्दे और बहस' तथा 'जगदीश गुप्त का काव्य : मनन और मूल्यांकन'। प्रकाशनाधीन पुस्तकें हमारा पर्यावरण। पुरस्कार/सम्मान : विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, गाँधीनगर द्वारा विद्या वाचस्पति', पर्यावरण एवं वन मन्त्रालय द्वारा ‘मेदिनी' पुरस्कार, हिन्दी साहित्य संस्थान, उत्तर प्रदेश का ‘सौहार्द' सम्मान, भारत में मॉरीशस के उच्चायुक्त द्वारा 'राष्ट्र गौरव सम्मान', राज्य कर्मचारी साहित्य परिषद, उत्तर प्रदेश का ‘पण्डित विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार', 'कादम्बरी' संस्था, जबलपुर द्वारा ‘स्व. श्री नर्मदा प्रसाद खरे पुरस्कार', जेमिनी संस्थान, पानीपत, हरियाणा द्वारा 'हिन्दी सेवी सम्मान', गीतांजलि फाउंडेशन द्वारा 'डॉ. जगदीश गुप्त' सम्मान, इत्यादि। सम्पर्क : टाइप-5/ए-5, वन विभाग कालोनी, विभूतिखण्ड, गोमतीनगर, लखनऊ मोबाइल : 7839435383, 9559282250 E-mail: mahendrapratapsingh 1960@gmail.com

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