Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Rani Naagfani Ki Kahani

by Harishankar Parsai
Save 32% Save 32%
Current price ₹85.00
Original price ₹125.00
Original price ₹125.00
Original price ₹125.00
(-32%)
₹85.00
Current price ₹85.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352292042
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 124
  • Original Price: INR 125.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 4th Edition
  • Item Weight: 100 grams
  • BISAC Subject(s): General

यह एक व्यंग्य-कथा है। ‘फेंटजी’ के माध्यम से मैंने आज की वास्तविकता के कुछ पहलुओं की आलोचना की है। ‘फेंटजी’ का माध्यम कुछ सुविधाआंे के कारण चुना है। लोक-कल्पना से दीर्घकालीन सम्पर्क और लोक-मानस से परम्परागत संगति के कारण ‘फेंटजी’ की व्यंजना प्रभावकारी होती है। इसमें स्वतन्त्राता भी काफी होती है और कार्यकारण सम्बन्ध का शिकंजा ढीला होता है। यों इसकी सीमाएँ भी बहुत हैं।मैं ‘शाश्वत साहित्य’ रचने का संकल्प करके लिखने नहीं बैठता। जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं होता, वह अनन्तकाल के प्रति कैसे हो लेता है, मेरी समझ से परे है।मुझ पर ‘शिष्ट हास्य’ का रिमार्क चिपक रहा है। यह मुझे हास्यास्पद लगता है। महज हँसाने के लिए मैंने शायद ही कभी कुछ लिखा हो और शिष्ट तो मैं हूँ ही नहीं। मगर मुश्किल यह है कि रस नौ ही हैं और उनमें ‘हास्य’ भी एक है। कभी ‘शिष्ट हास्य’ कह कर पीठ दिखाने में भी सुभीता होता है। मैंने देखा हैµजिस पर तेजाब की बूँदें पड़ती हैं, वह भी दर्द दबाकर, मिथ्या अट्टहास कर, कहता है, ‘वाह, शिष्ट हास्य है।’ मुझे यह गाली लगती है।

हरिशंकर परसाईजन्म : 22 अगस्त, 1924 ई., जमानी (इटारसी के पास) मध्य प्रदेश।शिक्षा : नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए.। किसी प्रकार की नौकरी का मोह छोड़कर परसाई ने स्वतन्त्र लेखन को ही जीवनचर्या के रूप में चुना। जबलपुर से 'वसुधा' नाम की साहित्यिक मासिक पत्रिका निकाली, घाटे के बावजूद वर्षों तक उसे चलाया, अन्त में परिस्थितियों ने बन्द करने के लिए लाचार कर दिया। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में वर्षों तक नियमित स्तम्भ लिखे- 'नई दुनिया' में 'सुनो भाइ साधो', 'नई कहानियाँ' में 'पाँचवाँ कालम' और ‘उलझी-सुलझी’, ‘कल्पना’ में ‘और अन्त में’ आदि, जिनकी लोकप्रियता के बारे में दो मत नहीं हैं। इसके अतिरिक्त परसाई ने कहानियाँ, उपन्यास एवं निबन्ध भी लिखे हैं।प्रकाशित पुस्तकें : ‘हँसते हैं रोते हैं’, ‘जैसे उनके दिन फिरे’, ‘दो नाक वाले लोग’, ‘रानी नागफनी की कहानी’ (कहानी-संग्रह); ‘तट की खोज’ (उपन्यास); ‘तब की बात और थी’, ‘भूत के पाँव पीछे’, ‘बेईमानी की परत’, ‘पगडंडियों का ज़माना’, ‘सदाचार का ताबीज़’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, ‘माटी कहे कुम्हार से’, और ‘अन्त में’, ‘हम इक उम्र से वाक़िफ़ हैं’ आदि (निबन्ध-संग्रह) ।सेसागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ के निदेशक रहे, मध्य प्रदेश शासन के शिखर सम्मान से सम्मानित, 1982 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार सम्मानित, जबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा डी. लिट्., उपाधि से विभूषित ।निधन : 10 अगस्त, 1995

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us