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Reetikaal Sexuality Ka Samaroh

by Sudhish Pachauri
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352296460
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 184
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): Comics & Graphic Novels

यह एक झकझोर देने वाली किताब है! यह अब तक लिखे गये हिन्दी साहित्य के इतिहास के 'निष्कर्षों' का 'रिवर्सल' करती है और रीतिकाल का 'उद्धार' करती है। यह सप्रमाण सिद्ध करती है कि रीतिकाल के कवि पहले फ्रीलांसर और प्रोफेशनल कवि थे, जो 'कविशिक्षा' दिया करते थे और जो हिन्दी के पहले रूपवादी और सेकुलर कवि थे।यहाँ, रीतिकाल की कविता अश्लील या निन्दनीय न होकर 'सेक्सुअलिटी का समारोह' है जिसमें, उस दौर में सचमुच जिन्दा और प्रोफेशनल स्त्रियाँ अपनी ‘देह सत्ता' और 'देह इतिहास' को रचती हैं। ये नायिकाएँ अपनी सेक्सुअलिटी के प्रति बेहद सजग हैं। कविता में उनकी जबर्दस्त दृश्यमानता उनको इस कदर ‘ऐंपावर' करती है कि उसे देखकर हिन्दी साहित्य के इतिहास लिखने वाले बड़े-बड़े आचार्यों को अपना ब्रह्मचर्य डोलता दिखा है और बदले में वे इन स्त्रियों को शाप देते आये हैं!यह किताब 'नव्य इतिहासवादी', 'उत्तर आधुनिकतावादी', ‘उत्तर-संरचनावादी' और 'सांस्कृतिक भौतिकतावादी' नजरिए से हिन्दी साहित्य के नैतिकतावादी दरोगाओं द्वारा रीतिकाल की इन चिर निन्दित स्त्रियों के सम्मान को बहाल करती है, रीतिकाल के कुपाठियों की वैचारिक राजनीति को सप्रमाण ध्वस्त करती है और रीतिकाल को नये सिर से पढ़ने को विवश करती है !-प्रकाशक

सुधीश पचौरी -पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग; पूर्व डीन ऑफ़ कॉलेजेज एवं पूर्व प्रोवाइसचांसलर, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ।जन्म : 29 दिसम्बर 1948, जनपद अलीगढ़ ।शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) (आगरा विश्वविद्यालय), पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ।मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार, मीडिया विशेषज्ञ । चर्चित पुस्तकें : नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अन्त; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन : स्वायत्तता और स्वतन्त्रता (सं.); उत्तर-आधुनिक परिदृश्य; उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; नामवर के विमर्श (सं.); उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्श; दूरदर्शन : विकास से बाज़ार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्श; देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में 'कामायनी'; मीडिया और साहित्य; टीवी टाइम्स; साहित्य का उत्तरकाण्ड; अशोक वाजपेयी पाठ कुपाठ (सं.); प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्य; दूरदर्शन : सम्प्रेषण और संस्कृति, स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; मीडिया, जनतन्त्र और आतंकवाद; निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद; विभक्ति और विखण्डन; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया की परख; पॉपूलर कल्चर के विमर्श; भूमण्डलीकरण, बाज़ार और हिन्दी ; टेलीविजन समीक्षा : सिद्धान्त और व्यवहार; उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्श; बिन्दास बाबू की डायरी; फासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति ।सम्मान : मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में 'कामायनी'); भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानित; दिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा 'साहित्यकार' सम्मान, शमशेर सम्मान एवं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान ।

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