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Renu Ki Aanchalik Kahaniyan

by Ed. by Dakshineshwar Renu
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789350727379
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 148
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): General

हिन्दी साहित्य में श्री फणीश्वरनाथ रेणु का प्रवेश सर्वप्रथम 1945 में साप्ताहिक विश्वमित्र (कलकत्ता) में प्रकाशित ‘बटबाबा’ शीर्षक कहानी से हुआ। यहीं से शुरू हुआ रेणु का हिन्दी साहित्य जगत में खुद को स्थापित करने का संघर्ष। बटबाबा छपने के बाद रेणु का हौसला बुलन्द हो गया और फिर एक-एक कर कई कहानियाँ उन्होंने लिख डालीं। इनमें कई कहानियाँ तो काफ़ी लोकप्रिय साबित हुईं। 1954 में उनका पहला उपन्यास ‘मैला आँचल' प्रकाशित हुआ । इस उपन्यास ने पूरे हिन्दी साहित्य जगत एक में सनसनी पैदा कर दी। हर किसी की जुबान पर सिर्फ़ रेणु का ही नाम था। इसके चर्चा में होने का कारण वह भाषा थी जो तत्कालीन हिन्दी साहित्य में दर्ज नहीं हुई थी। इस विशेष भाषा जो कि ग्राम अंचलों में बोली जाती थी - को रेणु ने बड़े ही ख़ूबसूरत ढंग एवं सजीवता के साथ 'मैला आँचल' में प्रस्तुत किया है। भारतीय हिन्दी कथा संसार में यह पहला उपन्यास था जिसे आंचलिक उपन्यास होने का गौरव प्राप्त हुआ, और रेणु थे पहले साहित्यकार । देखते-ही-देखते रेणु एक महान शिल्पकार के रूप में हिन्दी साहित्य में विराजमान हो गये। इसके बाद रेणु का दूसरा उपन्यास 'परती परिकथा' 1956 में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास भी काफ़ी लोकप्रिय सिद्ध हुआ। इसके साथ रेणु ने कई आंचलिक कहानियाँ भी लिखीं, जिनमें कि प्रमुख रूप से तीसरी कसम अर्थात् मारे गये गुलफ़ाम, दीर्घतपा, रसप्रिया, तीर्थोदक, एक आदिम रात्रि की महक, तीन बिन्दियाँ, अच्छे आदमी, ठेस, भित्ति-चित्र की मयूरी एवं संवदिया हैं।रेणु के कथा-साहित्य पर कुछ भी लिखना एक युग को जीने जैसा या फिर अथाह समुद्र में गोता लगाने जैसा कठिन और ख़तरनाक कार्य है। जैसा कि मेरा मानना है। रेणु के कथा समुद्र में जिसमें कई बहुमूल्य धातुओं के जैसी रचनाएँ बिखरी पड़ी हैं। 'रेणु की आंचलिक कहानियाँ' शीर्षक नाम की इस पुस्तक में सम्पादक ने कोशिश की है उन तमाम बिखरी बहुमूल्य रचनाओं को एकत्र कर एक ख़ूबसूरत गुलदस्ते में सजाने की ।

फणीश्वर नाथ रेणु -जन्म : 4 मार्च, 1921 ।जन्म-स्थान : औराही हिंगना, ज़िला पूर्णिया, बिहार ।राजनीति में सक्रिय भागीदारी। 1942 के भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में एक प्रमुख सेनानी की भूमिका निभायी। 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रान्ति और राजनीति में जीवन्त योगदान। 1952-53 में दीर्घकालीन रोगग्रस्तता के बाद साहित्य की ओर अधिक झुकाव ।1954 में पहला उपन्यास मैला आँचल प्रकाशित और बहुचर्चित । कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज आदि विधाओं में भी लिखा। जीवन के सन्ध्याकाल में राजनीतिक आन्दोलन से पुनः लगाव । पुलिस दमन का शिकार हुए और जेल गये। सत्ता के दमन चक्र के विरोध में पद्मश्री की उपाधि का त्याग । 11 अप्रैल, 1977 को देहावसान । प्रमुख कृतियाँ : मैला आँचल, परती परिकथा, कलंक-मुक्ति, जुलूस, कितने चौराहे, पल्टू बाबू रोड (उपन्यास) । ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी (कहानी-संग्रह)। ऋणजल-धनजल, वन तुलसी की गन्ध, श्रुत-अश्रुत पूर्व (संस्मरण) । नेपाली क्रान्ति कथा (रिपोर्ताज)।

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