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Sahitya Aur Samay Anthsambandhon Par Punarvichar

by Badri Narayan
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350002520
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 146
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 350 grams
  • BISAC Subject(s): General

साहित्य और समय : अन्तःसम्बन्धों पुनर्विचार - किसी भी समाज में समय एक नहीं होता। एक ही साथ एक ही समय में समाज के बहुत सारे समुदाय अलग-अलग समय बोधों में जी रहे होते हैं। समाज के सीमान्त पर रहने वाले दलित और आदिवासी समूहों के लिए आज का समय वही नहीं जो किसी मेट्रोपोल में रहने वाले सम्भ्रान्त नागरिक का है। समय सामाजिक सन्दर्भों में समय का अर्थ निर्मित होता है जिसे विभिन्न समुदाय अपने-अपने अनुभवों के आधार पर उससे अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं। समय की बृहत्ता को समुदाय अपने-अपने सन्दर्भों में विरचित करके अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। इसीलिए साहित्य में भी समय की अवधारणा को एक रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। विभिन्न अनुभव क्षेत्रों से आये हुए रचनाकार अपनी-अपनी रचनाओं में एक ही समय का बोध कराते हैं। यह पुस्तक पहली बार विभिन्न काल खण्डों में अवस्थित विभिन्न विधाओं के रचनाकारों को एक साथ एकत्रित कर उनकी अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त होने वाले समय बोधों की पड़ताल करती है। इसीलिए इस पुस्तक में समकालीनता का भी एक होमोजेनियस अर्थ की जगह बहुल अर्थ व्यक्त होता है।

बद्री नारायण - बद्री नारायण, गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के सेंटर फॉर कल्चर, पावर एण्ड चेंज में सामाजिक इतिहास/सांस्कृतिक नृत्तत्त्वशास्त्र विषय में संकाय सदस्य हैं। वे यहाँ पर विकसित हो रहे मानव विकास संग्रहालय एवं दलित रिसोर्स सेंटर के भी प्रभारी हैं। ये यू.जी.सी., आई.सी.एस.एस.आर., आई.सी.एच.आर. तथा इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़, शिमला के फ़ेलो रह चुके हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एशियन स्टडीज, लाइडेन, मैसौन द साइंसेज द लॉ होम, पेरिस में भी फ़ेलो रहे हैं। फुलब्राइट एवं स्माट्स फ़ेलोशिप भी उन्हें मिली है। वे हिन्दी के बहुचर्चित युवा कवि हैं। वे हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में इतिहास, साहित्य एवं समाज वैज्ञानिक मुद्दों पर लिखते हैं। उनके दो कविता संकलन 'सच सुने कई दिन हुए' और 'शब्दपदीयम्' काफ़ी चर्चित रहे हैं।सम्पादन सहयोगी अर्चना सिंह, बृजेन्द्र कुमार गौतम, निवेदिता सिंह, ऋचा पाण्डेय तथा ऋतु सुरेका दलित संसाधन केन्द्र, गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद में शोध-सहायक के रूप में कार्यरत हैं।

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