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Sahitya Ke Sarokar

by Vidyaniwas Mishra
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181436399
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 184
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

साहित्य के सरोकार - लेखक का सरोकार लेखक को अपने प्रति, अपने भीतर के मनुष्य के प्रति तो है, पर उसके बारे में प्रश्न करने वाला भी भीतर का ही आदमी होगा, जो मेरे मन की आवाज़ को सुन नहीं सकता वह आदमी क्यों मुझसे प्रश्न करे? मेरे लिखने का स्रोत बाहर तो है नहीं, भीतर है। इसीलिए मेरी दृष्टि में सरोकार से अधिक साहित्य का रिश्ता चिन्ता से है। साहित्य भीतर की बेचैनी से ही उकसता है। उसी तरह जैसे कि बीज धरती में डाला जाता है और थोड़ी ऊष्मा से तपता है तो अँखुआ बन जाता है। यदि ठण्डे स्थान में रहता है तो वह बीज ही बना रहता है। कालिदास ने इसी व्यापार को पर्युत्सुकी भाव कहा है जो उत्सुक नहीं है, उत्कण्ठित नहीं है, चैन से उसको किसी अनजानी, अनहोनी चिन्ता से किसी अप्रत्यक्ष दिशा की ओर आकुल कर देने वाला व्यापार ही पर्युत्सुकी भाव है। यही साहित्य का धर्म है। जहाँ कोई हो, वहाँ से उसका विस्थापित होना, चाहे थोड़े ही समय के लिए क्यों न हो, साहित्य के प्रभाव का सबसे सटीक प्रमाण है। पर यह बेचैनी देश और काल की सीमाओं कों लाँघ करके होती है।★★★साहित्य की एक भूमिका बड़ी जबरदस्त है। वह जनतन्त्र की भावना को जगाये रखता है, क्योंकि साहित्य का प्राण है असहमति। बाणभट्ट ने ‘हर्षचरित’ लिखा, हर्ष आश्रयदाता थे; लेकिन उसमें जहाँ वह प्रसंग आता है जहाँ हर्ष की सेना राज्यश्री को ढूँढ़ने और मौखरि राजधानी पर आक्रमण करने वाली सेना का पीछा करने निकली है। वहाँ पर बाणभट्ट का चित्त उद्विग्न हो जाता है, क्योंकि सेना विंध्य के उपान्त ग्रामों की फ़सल कुचलती हुई जा रही है। उनका उद्वेग कई रूपों में प्रकट होता है। बच्चे दूर से सैनिकों को चिढ़ाकर भाग रहे हैं। एक अध्यापक निर्भय होकर सामने आता है - कैसा राजा, जिसकी सेना किसानों की फ़सल बरबाद कर रही है। सबसे करुण प्रसंग तब आता है जब कुछ ख़रगोश झाड़ियों से प्रयाण करती हुई सेना की पगचाप सुन कुतूहलवश बाहर निकलते हैं और सैनिकों के पदत्राणों से कुचले जाकर चिन्दी-चिन्दी-बिखर जाते हैं। इस निर्ममता का बहुत ही द्रावक वर्णन बाणभट्ट ने किया है। मुझे ऐसा लगता है कि ‘हर्षचरित’ को इसीलिए बाणभट्ट ने अधूरा छोड़ दिया था। सम्भवतः राज्याश्रय को भी इसीलिए वे आगे सहन नहीं कर पाये। रीतिकाल के भी बहुत सारे कवि हैं, जो राज्याश्रय में रहकर भी राज्याश्रय को ठुकराते रहे। साहित्यकार किसी का मनसबदार बनकर रहना नहीं गवारा कर सकता। वह इसलिए जनतन्त्र में एक कारक घटक बनता है, प्रतिरोध की शक्ति देता है-सत्ता के प्रतिरोध की शक्ति; साहस के साथ खड़े होने का निर्भय भाव देता है।

विद्यानिवास मिश्र (1926-2005) - विद्यानिवास मिश्र हिन्दी और संस्कृत के अग्रणी विद्वान, प्रख्यात निबन्धकार, भाषाविद् और चिन्तक थे। आपका जन्म गोरखपुर ज़िले के ‘पकड़डीहा' ग्राम में हुआ। प्रारम्भ में सरकारी पदों पर रहे। तत्पश्चात् गोरखपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ और फिर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आचार्य, निदेशक, अतिथि आचार्य और कुलपति के पदों को सुशोभित किया। कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालयों में अतिथि प्रोफ़ेसर एवं ‘नवभारत टाइम्स' के प्रधान सम्पादक भी रहे।अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए आप भारतीय ज्ञानपीठ के 'मूर्तिदेवी पुरस्कार', के. के. बिरला फ़ाउंडेशन के 'शंकर सम्मान', उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के सर्वोच्च 'विश्व भारती सम्मान', भारत सरकार के 'पद्मश्री' और 'पद्मभूषण', 'भारत भारती सम्मान', 'महाराष्ट्र भारती सम्मान', 'हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार', साहित्य अकादेमी के सर्वोच्च सम्मान 'महत्तर सदस्यता', हिन्दी साहित्य सम्मेलन से 'मंगला प्रसाद पारितोषिक' तथा उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी से 'रत्न सदस्यता सम्मान' से सम्मानित किये गये और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे।बड़ी संख्या में प्रकाशित आपकी पुस्तकों में व्यक्ति-व्यंजक निबन्ध संग्रह, आलोचनात्मक तथा विवेचनात्मक कृतियाँ, भाषा-चिन्तन के क्षेत्र में शोध ग्रन्थ और कविता संकलन सम्मिलित हैं।

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