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Samar Gatha

by Narendra Jain
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789392013355
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 136
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): General

लब खुले, बाँहें फैलीं,खामोशी को तोड़ते शब्द और अहर्निश नदी की तरह बहते विचार एवं उनके समुच्चय का नाम है‘समर गाथा’। यह सिर्फ एक विचार पर कदमताल करते स्वरों का कलरव नहीं, बल्कि अलग-अलगसमय में उपजे विचारों का संकलन है। यह ताली-बजाऊ संस्कृति के विरुद्ध सघन और विवेकउद्वेलन का आवश्यक जनमार्ग है। यह सिर्फ विभिन्न दिनों में लिखे गए पत्रकारीय आग्रहभर नहीं है, इसमें सच और अनुभव को व्यक्त करने का जरूरी सामर्थ्य भी है। इसमें गहराईऔर संश्लिष्टता है, बोधगम्यता है।यह वह केंद्रीभूतधारणा है, जिसने ‘समर गाथा’ को पुस्तकाकार लेने में मेरी मदद की। मुरली, घर-आँगन, वन-उपवन,मन-तन की नहीं, जीवन की अहर्निश गूँज का नाम है ‘समर गाथा’। आप भिज्ञ हैं कि प्राणका रूपांतर भाषा है, इसमें प्रवाह है, स्पर्श है। प्रवाह है, इसलिए गति है, स्पर्शहै, इसीलिए संवाद भी है। मैंने जब-जब इन आलेखों को पढ़ा, इसमें तैरता रहा। मुझे लगाकि इसमें सामयिक दृष्टिबोध है, कहन है, कहन में जरूरी घनत्व है, फिर भी बहाव है; जैसेसभी नदियाँ सरस्वती हैं और सभी पहाड़ पुण्य।यह पुस्तक आपको अपनेदृष्टिकोण का विकास करने में मदद करेगी। कृपा करेंगे कि इसके पात्रों को हिंदू-मुसलमानके चश्मे से नहीं, क्रांतिकारी के रूप में देखेंगे तो समय और समाज को समझने में मददमिलेगी।—डॉ. पियूष जैनराष्ट्रीय सचिव, पैफ

2 अक्तूबर, 1954 कोमध्य प्रदेश भिंड जिले के मौ कस्बे में जनमेनरेंद्र जैन (नंदाजी) के लिए अभिव्यक्ति ही अभिव्यंजना थी। अपनी और साथियों की अभिव्यक्तिकी ही नहीं, बेटियों और महिलाओं की यथोचित अभिव्यक्ति के लिए प्रतिबद्ध नरेंद्र जैनसंगीत, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष में भी पारंगत थे। भाषा की रवानी और मनुष्य के प्रतिसहज स्नेह ने उन्हें सभी विचारधाराओं के कटिबद्ध लोगों का समभावी मित्र बना दिया। उर्दू,अरबी, हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत के सिर्फ जानकार नहीं वरन् उद्भट विद्वान् श्री जैनने अपनी रचनाओं में संप्रदायों का भेद नहीं आने दिया; उनके लिए क्रांति सिर्फ क्रांतिथी। वे उसे वर्गभेद की तरह व्यवस्थित नहीं करते। नरेंद्रजी ने अपनेलेखों से हर दिल पर अपने हस्ताक्षर किए, एक समझौता-विहीन लेखक की तरह। इस विमर्श मेंआपको राष्ट्र, आधुनिकता और बौद्धिकता एक साथ दिखाई देगी। इसलिए उनका रचना-संसार बाढ़विमुक्त, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक दृष्टि लिये है। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में राष्ट्र-गौरव,क्रांति का निनाद, सामाजिक न्याय, समानता, आर्थिक स्वतंत्रता और मनुष्य का समभाव परिलक्षितहोता है। कम समय में विदा लेगए नरेंद्र जैन अपनी रचनाओं में सिर्फ वाक्य और समुच्चय ही नहीं दे गए, एक अनुगूँजछोड़ गए, जो लंबे अंतराल तक सुनाई देती रहेगी, अपने मटमैले संवादों के बावजूद यथार्थको तेजोदीप्त करते हुए। स्मृतिशेष 3 दिसंबर, 2007

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