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Samvaidhanik Dayitva Evam Karyanvayan

by Dr. Dhanesh Dwivedi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789369443260
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 678
  • Original Price: INR 1495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 600 grams
  • BISAC Subject(s): General

15 अगस्त सन् 1947 को जब देश अंग्रेज़ों के चंगुल से आज़ाद हुआ तब देश में छोटी-बड़ी कुल मिलाकर 562 देशी रियासतें थीं जिन्होंने स्वतंत्र भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के अनुरोध पर अपने सभी अधिकार त्यागकर भारत में विलय होना स्वीकार किया। प्राप्त पुष्ट साक्ष्यों के आधार पर इनमें से बहुत सारी रियासतों की शासन व्यवस्था, शिक्षा आदि का माध्यम हिंदी भाषा थी, जिसका प्रयोग बहुत पहले से होता आ रहा था। उत्तर भारत के हिंदू राज्यों में हिंदी की सर्वत्र यही स्थिति थी। ऐसे राज्यों के दरबार की ही नहीं, राजपरिवारों की भाषा भी हिंदी ही थी| हिंदी कवियों-साहित्यकारों को पूरा सम्मान-प्रोत्साहन और प्रश्रय प्राप्त था और सबसे मुख्य बात यह थी कि अधिकांश भूपतियों सहित राजपरिवारों के सदस्य भी हिंदीप्रेमी तथा हिन्दीसेवी थे, बड़ी सुंदर कविताएँ किया करते थे। बीसवीं शताब्दी में ही स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व मध्य भारत तथा राजस्थान की कई रियासतें अपना कामकाज हिंदी में करती थीं। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद एक विचित्र स्थिति दिखाई पड़ी। कई ऐसे विभाग थे जो पहले अपना काम हिंदी में करते थे, रियासतों के विलय हो जाने पर तथा आयकर आदि संबंधी कार्य केंद्रीय विभागों के अंतर्गत आ जाने पर, अंग्रेज़ी में करने लगे। यह परंपरा कहाँ से आरंभ हुई, कहना मुश्किल है किंतु समय के साथ और बलवती होती गई। भाषा के नाम पर विचारों की लड़ाई प्रारम्भ हुई और एक भाषा जिसे राष्ट्रभाषा का नाम दिया जाने लगा, उस पर चर्चाएँ जोर पकड़ने लगीं। आख़िरकार मामला संसद तक पहुँचा और भाषा व्यवस्था मज़बूत करने के नाम पर बहस प्रारंभ हुई। कई बार प्रयास किए गए और अंततः जो हिंदी राष्ट्रभाषा के प्रश्न के साथ संसद में खड़ी हुई थी, 14 सितंबर 1949 को एकमत से राजभाषा के रूप में अंगीकार की गई। आज जब राजभाषा के रूप में स्थापित हुए हिंदी का 75 वर्षों से अधिक का समय बीत चुका है, इसने अपना दायरा भी बढ़ाया है। देश की राजभाषा से आगे वह वैश्विक स्तर पर शीर्ष की भाषाओं में शुमार हो चुकी है। उसका वैश्विक कद हर क्षेत्र में विस्तार पा चुका है। इस पुस्तक में हिंदी के राजभाषा बनने और वर्तमान समय तक विस्तार पाने की यात्रा का उल्लेख है, साथ ही राजभाषा के रूप में हिंदीप्रेमियों के कार्य करने की दिशा व दशा का विस्तृत वर्णन किया गया है। सरकारी कार्यालय के लिए राजभाषा में कार्य करने के आदेश, निर्देश, रिपोर्टिंग आदि संबंधी जानकारी भी इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों को प्राप्त होगी। ऐतिहासिक घटनाओं से होते हुए तकनीकी प्रगति तथा वैश्विक पहुँच तक की यात्रा का समेकित वर्णन उपलब्ध कराने का यह गिलहरी प्रयास पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी होगा, ऐसा दृढ़ विश्वास है।

डॉ. धनेश द्विवेदी भारतीय राजदूतावास, नेपाल में अताशे (हिंदी एवं संस्कृति) के रूप में कार्य कर रहे हैं। इससे पूर्व वे भारत सरकार के गृह मंत्रालय में उप संपादक, भारतीय वायु सेना में वायुसैनिक तथा बैंककर्मी के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। इन्होंने राजस्थान के सबसे पुराने अखबार 'दैनिक नवज्योति' में पत्रकारिता भी की है। वरिष्ठ कवि व लेखक डॉ. द्विवेदी हिंदी, अंग्रेजी के अतिरिक्त रूसी, फ्रेंच, उर्दू तथा अरबी भाषाओं के ज्ञाता हैं तथा देश-विदेश में सम्मानित व अलंकृत हैं। समय की कसौटी पर समकालीन साहित्यकार, मुस्लिम वयस्क और मीडिया जैसी पुस्तकों के लेखक डॉ. धनेश द्विवेदी पत्रकारिता में पीएच. डी. नियमित रूप से डॉ. द्विवेदी की ग़ज़लें, कविताएँ, लघुकथाएँ, लेख/आलेख समाचारपत्रों और विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. द्विवेदी देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर कविता - पाठ भी करते रहे हैं। इनकी कविताओं, ग़ज़लों और लघुकथाओं में सामाजिक मुद्दों पर चिंतन देखा जा सकता है। वर्तमान की विभिन्न परिस्थितियों पर इनके व्याख्यान समय-समय पर सुनने को मिलते रहते हैं।विभिन्न स्तरों पर पुरस्कार प्राप्त डॉ. धनेश द्विवेदी को हिन्दी दिवस 2020 के मौके पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय द्वारा घोषित 'राजभाषा गौरव पुरस्कार' योजना में माननीय राष्ट्रपति महोदय द्वारा प्रदत्त उत्कृष्ट लेखों के लिए प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।हाल ही में मालवीय मिशन द्वारा 'पं. मदन मोहन मालवीय सम्पूर्ण वाङ्मय' के संस्करण-1 (1-11 खंड) के प्रथम खंड के संपादन में डॉ. धनेश द्विवेदी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। डॉ. द्विवेदी अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर रहते हुए साहित्य-सृजन का भी प्रयास करते रहते हैं। मार्च 2024 में इन्होंने गया मिथक (एक प्रेमकथा) का सृजन भी किया है।इनकी लघुकथा की पुस्तक मेरी इकतीस लघुकथाएँ हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी तथा रूसी भाषाओं में एक साथ प्रकाशित हुई, जिसे 'गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड' की श्रेणी में शामिल किया गया है।

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