Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Sangatrash

by Sadanand Shahi
Save 35% Save 35%
Current price ₹277.00
Original price ₹425.00
Original price ₹425.00
Original price ₹425.00
(-35%)
₹277.00
Current price ₹277.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789372766950
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 172
  • Original Price: INR 425.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 350 grams
  • BISAC Subject(s): Literary

बुद्ध की रिडायरेक्टेड चिट्ठीया सन्तों का चिट्ठीरसाअपने चौथे कविता-संग्रह संगतराश तक आते-आते सदानन्द शाही ने हिन्दी कविता में अपनी अलग, विशिष्ट और मुकम्मल मौलिक पहचान बना ली है। इस पहचान की पृष्ठभूमि में समय और वर्तमान की वास्तविकताओं को कविता में निर्भयता के साथ अन्तर्भुक्त करने की निरन्त-संलग्न, संश्लिष्ट, ईमानदार चेष्टा और संघर्ष को पढ़ा-देखा और समझा जा सकता है। कविता के इस रास्ते का रहस्य उस रास्ते को ही पता है, जो 'उस लड़की के जाने से बना था' या 'जैसे चिड़ियाँ आसमान को चीरती हुई रास्ता बनाती हैं'। एक ऐसा दुर्गम मार्ग, जहाँ — 'बेटियाँ ही नहीं, धरती की चींटियाँ भी रो रही हैं। इस रुलाई का हिन्दी अनुवाद कौन करेगा?' ऐसी भाषा में 'अनुवाद', जिसने 'जितने भी शब्द दिये हैं, सबके सब ना- काफ़ी हैं, हमें जानने के लिए/ इन शब्दों ने जो दर्द दिये/ सिर्फ़ हम जानते हैं/ जो हम पर बीतता है/ सिर्फ़ हम जानते हैं'। महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसे समय में, जब कविता— 'अब इसके आगे क्या'— जैसे प्रश्न के साथ दुविधाग्रस्त बिन्दु तक पहुँच कर दिग्भ्रान्त खड़ी है, सदानन्द शाही का यह संग्रह आने वाली भिन्न वैचारिक- विन्यास की सम्भावित दिशाओं- दरवाज़ों की कविताओं का महत्त्वपूर्ण संकेतक हो सकता है — जैसे तर्जनी किन्हीं दिशाओं की ओर इशारा कर रही हो। सदानन्द शाही की केन्द्रीय और लगभग मौलिक काव्य-शक्ति इस बात में निहित है कि वे अपने समय और वास्तव के विपर्यासों या विरोधाभासों की तीव्र, स्पष्ट और सघन व्यंजनाओं में भी हास्य की कैफ़ियत या 'आभाव' (असर) पैदा कर लेते हैं। कभी अभिव्यंजना और तुरत उसी पाठ-पल में सम्प्रेषण। जैसे कबीर या स्मित बुद्ध की हँसी, जो चोट नहीं पहुँचाती, पाठक की प्रमादग्रस्त अलसायी चेतना को अपने स्पर्श से जगाती है। यहाँ बीसवीं सदी के सबसे आक्रान्त दशकों में, गहरे अन्तर्द्वन्द्व और आत्मसंघर्ष से जूझते आधुनिक अंग्रेज़ी कविता के पितामह एज़रा पाउंड का कथन सहज याद आता है-'मेरी कविता (अध्यापक की तरह) 'पढ़ाती' नहीं है, वह अपने पाठक को 'जगाती' है'। और यह 'जगाना' अपने मूलार्थ में ग्रीक 'रेनेसाँ' या 'नव-जागरण' के निकट था। यानी, हर सच्ची-अच्छी कविता अपने हर एकान्तिक पाठ में, अपने हर सच्चे-अच्छे पाठक की चेतना में एक वैयक्तिक 'नव-जागरण' को जन्म देने का सामर्थ्य रखती है। सदानन्द शाही की कविताओं की परिव्याप्ति चकित करती है। एक ओर अत्यन्त संक्षिप्त, हाइकु की तरह, अर्थपूर्ण, किफ़ायती, बस कुछ ही वाक्यों-पंक्तियों में पूरी होती कविताएँ -'फ़क़त कुछ शब्द/ और सच को सलीके से कहने का साहस'। या-'आँसू की दो बूँदें/ लुढ़कीं/ पसीने से जा मिली/ ...जैसे कोई नदी/ दूसरी नदी से जा मिली हो।' तो दूसरी ओर 'मझली मामी' जैसी लम्बी, अत्यन्त मार्मिक, आत्मीय, स्त्री-जीवन की त्रासदी को व्यक्त करती अविस्मरणीय कविता- 'जब वे गयीं/ उनके बिस्तर पर/दो ही चीजें छूट गयी थीं/ एक छोटा-सा कजरौटा / और एक करुण-सी मुस्कान।' यह छोटी-सी टिप्पणी कवि सदानन्द शाही के ताज़ा संग्रह - संगतराश में संकलित कविताओं के आइसबर्ग का फ़क़त एक 'टिप' भर है। पूरा विश्वास है कि ये कविताएँ मौजूदा समय की अन्य कविताओं से वह ओझल प्रति-दृश्य प्रस्तुत करने का श्रेय और सम्मान हासिल करेंगी, जिसे देखा-सुना और अनिवार्यतः पढ़े जाने का यह आपात् समय है। - उदय प्रकाश

सदानन्द शाही जन्म : 7 अगस्त 1958, सिंगहा (कुशीनगर),उ.प्र.। गोरखपुर और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन। DAAD फेलोशिप के तहत साउथ एशिया इंस्टीट्यूट हाइडेलबर्ग, जर्मनी में विजिटिंग फेलो रहे। फ्रांस, इटली, अमेरिका,मारीशस, सिंगापुर की शैक्षणिक यात्राएँ। असीम कुछ भी नहीं (1999), सुख एक बासी चीज़ है (2015), माटी-पानी (2018) कविता-संग्रह, मेरे राम का रंग मजीठ है : बेगमपुर की कविता (काव्यान्तरण, 2021)। अपभ्रंश के धार्मिक मुक्तक और हिन्दी सन्त काव्य (1991), ए हिस्ट्री ऑफ़ हिन्दी लिटरेचर एफ. ई के का हिन्दी अनुवाद (1998), दलित साहित्य की अवधारणा और प्रेमचन्द (2000-2025), स्वयंभू (2002), हरिऔध रचनावली (दस खण्डों में, 2010), परम्परा और प्रतिरोध (2010), मुक्तिबोध : आत्मा के शिल्पी (2020), गोदान को फिर से पढ़ते हुए (2020), रहिमन धागा प्रेम का (2022), प्रेमचन्द : जीवन और सृजन/वी. एस. नरवणे (2022), कविता में काशी (2023) किताबें प्रकाशित। सम्प्रति : 'साखी' पत्रिका का सम्पादन। निदेशक, प्रेमचन्द साहित्य संस्थान। 'बुद्ध की धरती पर कविता' शृंखला तथा 'चरथ भिक्खवे' नाम से बुद्ध परिपथ की साहित्यिक यात्राओं के माध्यम से बुद्ध की खोज।

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us