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Sanskriti Aur Samvedana

by Vyas Mani Tripathi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789362875327
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 152
  • Original Price: INR 550.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

संस्कृति और संवेदना - भारतीय चिन्तन में परम्परा और आधुनिकता को लेकर बहुत द्वन्द्व नहीं रहा है। प्राचीनता को सदैव सर्वोत्तम मानने और नवीनता को उपेक्षित करने की परिपाटी हमारे यहाँ नहीं रही है बल्कि इन दोनों को समन्वय, सामंजस्य और अन्तरण की व्यवस्था में साधने की कोशिश की जाती रही है। यही कारण है कि हमारी संस्कृति बाह्य आघातों से न कभी टूटी और न कभी हारी बल्कि अपने अनुकूलन- गुण के कारण विभिन्न परिस्थितियों में अक्षुण्ण बनी रही। समय के प्रवाह में परिस्थितियाँ बदलीं किन्तु मूल स्वरूप कभी विनष्ट नहीं हुआ। आज बाज़ार ने हमारे घरों में, घुसपैठ द्वारा हमारी नियति और नीति को अर्थकेन्द्रित कर दिया है। हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों की दुनिया बदल दी है। अर्थार्जन और अर्थ दोहन में व्यस्त आज की पीढ़ी के पास मूल्यों के संरक्षण का उत्साह नहीं रह गया है। धनलोलुपता अथवा धन की अधिकता ने समाज का चेहरा और चरित्र बदलकर रख दिया है। उपभोक्तावादी संस्कृति की चुम्बकीय शक्ति इतनी प्रबल है कि हमारा मन-मस्तिष्क उसी की गिरफ़्त में है । दर्पण में झिलमिलाते बिम्ब को वास्तविक मान उसकी ग्राह्यता के लिए हमें किसी भी हद तक जाना स्वीकार्य है । हम वह सब कुछ प्राप्त करने के लिए आतुर और लालायित हैं जो हमारे अपने जीवन के यथार्थ से कोसों दूर है। ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि हम साहित्य, कला, अध्यात्म, दर्शन तथा उन सभी मूल्य तत्त्वों का समाकलन करें जिनसे हमारी संस्कृति की संरक्षा को ऊर्जा मिलती हो। उन आसन्न संकटों से सचेत एवं सावधान हों जो आत्मीयता, बन्धुता, स्नेह, मर्यादा, आदर्श और सम्बन्धों की उष्णता पर गाज गिराने के लिए सचेष्ट हैं। आज, सांस्कृतिक प्रभुत्ववाद के ख़तरों से निपटना भी जरूरी हो गया है क्योंकि संस्कृतियों की विविधता को ध्वस्त कर उन्हें समरूप बनाने की साज़िशों हो रही हैं। बहुराष्ट्रीय विज्ञापन उद्योग नवता के नाम पर परम्परागत जीवन-शैली को निर्मूल करने के अनेक उपायों पर कार्य कर रहा है। सांस्कृतिक प्रभुत्व, सांस्कृतिक समरूपता, सांस्कृतिक ध्रुवीकरण, सांस्कृतिक संकरण जैसी समस्याएँ सिर उठा रही हैं। इनके माया जाल से मुक्ति के लिए अपने स्वत्व और सांस्कृतिक विरासत का ज्ञान और संरक्षण आवश्यक है।- इसी पुस्तक से

व्यास मणि त्रिपाठी -जन्म : 1 अक्तूबर 1959 को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिलान्तर्गत बढवलिया नामक गाँव में।• शिक्षा : गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर से हिन्दी में एम.ए. और पीएच.डी.।प्रकाशित पुस्तकें : कविता, कहानी, निबन्ध, आलोचना, लोक-कथा आदि की 38 पुस्तकें प्रकाशित। जिनमें साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर', नन्ददास, अण्डमान का हिन्दी साहित्य और अण्डमान तथा निकोबार की लोक कथाएँ तथा प्रकाशन विभाग, नयी दिल्ली से भारतीय स्वाधीनता संग्राम और अण्डमान पुस्तकें शामिल हैं। प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में सैकड़ों शोध लेख, समीक्षा, कविताएँ, कहानियाँ, संस्मरण प्रकाशित।भारतीय साहित्य कोश, भारतीय लोक-साहित्य कोश, भारतीय बाल साहित्य कोश सहित 42 पुस्तकों में सहलेखन।सम्मान : दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 'विश्व हिन्दी सम्मान'। मध्य प्रदेश साहित्य अकादेमी का ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आलोचना' पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का 'रामविलास शर्मा सर्जना' पुरस्कार। हिन्दुस्तानी एकेडेमी, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज का 'महावीर प्रसाद द्विवेदी आलोचना' पुरस्कार। विद्या वाचस्पति और विद्या वारिधि की मानद उपाधियों सहित अन्य दर्ज़नों पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त।वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकें : भवानी प्रसाद मिश्र : अनुभव वैविध्य के अप्रतिम सर्जक, समकालीन संवेदना की परख, कविता की नयी संवेदना, कविता की समकालीन संवेदना।सम्प्रति : अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, जवाहरलाल नेहरू राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर।

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