Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Satkatha kahi Nahin Jati

by Mukesh Verma
Save 35% Save 35%
Current price ₹257.00
Original price ₹395.00
Original price ₹395.00
Original price ₹395.00
(-35%)
₹257.00
Current price ₹257.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350000892
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 152
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): General

समकालीन हिन्दी कथा साहित्य में मुकेश वर्मा का अपना एक स्थान है। इनकी ये कहानियाँ जीवनानुभवों से सींच कर निकली हुई कहानियाँ हैं। ऐसा लगता है मानो ये कहानियों के जरिए जीवनानुभवों से मुक्ति का मार्ग तलाश रहे हों। एक कथाकार के रूप में मुकेश वर्मा की रेंज बहुत बड़ी और व्यापक है। एक हद तक समाज की अलग-अलग विद्रूपताओं और विडम्बनाओं को अपनी कथाओं के माध्यम से समझने का आईना हैं ये कहानियाँ। सच तो यह है कि ये कहानियाँ भूगोल में गुमशुदा आम आदमी की तलाश के साथ-साथ एक अलग धरातल और लगभग अनदेखे कोने और अछूते विषय की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में शहर और गाँव-कस्बे की सभ्यताओं का द्वन्द्व साफ़ परिलक्षित होता है। यानी इनमें समाज का वह विद्रूप चेहरा है जिससे तेजी से बढ़ता पूँजीवाद और अमानवीयता रह-रहकर छीज रही है। यही विशेषता इन कहानियों में एक ख़ास किस्म की रवानी पैदा करता है। विचार इन कहानियों में से सारतत्व की तरह निकलकर आता है और ये मनुष्य की जीवन्तता और नवनवोन्मेष का वितान फैलाती, जिन्दगी के झंझावातों और आपदाओं में उलझकर नये रास्ते ही नहीं तलाशती हैं, बल्कि अपनी सहजता में जीवन की मुश्किलों और बेचारगी का वृत्तान्त रचती हैं। इन कहानियों की बड़ी विशेषता है इनकी तीखी, शोख़ और इनकी वह खिलन्दड़ रचनात्मक शैली, जो पाठक की अँगुली पकड़ उसे अपने साथ चलने के लिए बाध्य करती है। इसीलिए ये स्थितियों और सामाजिक सरोकारों में जीवित रहने के संघर्ष के क्रम में अलग-अलग सामाजिकताओं से रू-ब-रू कराती हैं। इन कहानियों की एक और विशेषता है इनका विलक्षण खुरदरापन जिसे लेखक ने अपने लोक अनुभवों से सींचकर रोचक, आत्म-व्यंग्य लहजे और पैनेपन के साथ प्रस्तुत किया है। मुकेश वर्मा की कहानियों में सहज और प्रवाहपूर्ण शैली होने से कथारस और पठनीयता और बढ़ जाती है। कहानी पढ़ने के बाद पाठक लम्बे समय तक उसके पात्रों और घटनाओं के बारे में सोचता रहता है। ये कहानियाँ शहरी और नगरीय जीवन के मध्यवर्गीय समाज के यथार्थ को उद्घाटित करती हैं। शहरी जीवन से लेकर गाँव-कस्बों से जुड़ी आम आदमी की संवेदनाएँ, समस्याएँ, उनके सपने, उनके संघर्ष, घुटन, संत्रास और उनके यथार्थ सभी कुछ तो है इन कहानियों में निस्सन्देह मुकेश वर्मा का अनुभव क्षेत्र आम हिन्दी कथाकारों से बहुत अलग व व्यापक है। इसलिए इस संग्रह की कहानियों में विषयगत विविधता भी है और नयापन भी। कथा- शैली इनकी एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है, तो संवादों की बहुलता तथा सरलता इनका सबल पक्ष है। वास्तव में इन कहानियों का जीवन आम मध्यवर्गीय जीवन है। आसपास के हमारे अपने से दिखते पात्रों के भीतर उठते-गिरते मनोभावों की कहानियाँ हैं ये छोटे-छोटे विवरण कहानियों की सघनता बढ़ाते हैं और तर्क की कसौटी पर ये कहानियों अपनी बात कहने की पूर्ण क्षमता रखती हैं।-भगवानदास मोरवाल

मुकेश वर्माजन्म : 02 फ़रवरी, 1947, सागर (मध्यप्रदेश)।शिक्षा : सागर विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास में एम.ए. और एल.एल.बी.।व्यवसाय : एडीशनल कमिश्नर (सह.) के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वाध्यायी लेखन।विदेश यात्रा : यू. एस. ए., कनाडा, इंग्लैण्ड, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, जर्मनी, बेल्जियम, मॉरीशस, दुबई, मलेशिया, थाईलैण्ड, सिंगापुर के अलावा श्रीलंका, नेपाल आदि देशों की यात्रा।प्रकाशन : पहली कहानी 'न्यायाधीश' सन् 1985 में 'साक्षात्कार' में प्रकाशित । इसके अलावा 'हंस', 'कथन', 'कथादेश', 'वागर्थ', 'साक्षात्कार', 'शुक्रवार', 'रचना समय', 'वर्तमान साहित्य', 'वसुधा', 'कादम्बिनी', 'प्रेरणा', 'पहले-पहल' आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों का प्रकाशन। गद्य-विधा की अनेक महत्त्वपूर्ण कृतियों पर आलोचना-कर्म।पहला कथा संग्रह 'खेलणपुर और अन्य कहानियाँ' व्यापक रूप से चर्चित। दूसरा संग्रह 'इस्तगासा' वर्ष 2004 में प्रकाशित।अन्य उपक्रम : हिन्दी के जाने-पहचाने लेखकों के अलावा नये रचनाकारों को आगे लाने और मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मित्रगण के सहयोग से वर्ष 1994 से भोपाल में साहित्य गोष्ठियों में लगभग 114 कवि, कथाकारों, नाट्यलेखकों और आलोचकों के कार्यक्रम आयोजित किये। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं और उपक्रमों से जुड़ाव और सहभागिता।सम्मान : 'साक्षात्कार' में प्रकाशित 'बलि' एवं अन्य छोटी कहानियों के लिए 'स्व. रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार'; म.प्र. लेखक संघ का 'सारस्वत सम्मान'; म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 'वागीश्वरी सम्मान'; अभिनव कला परिषद् का 'अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान' एवं अन्य स्थानीय सम्मान।सम्प्रति : मासिक साहित्यिक पत्रिका 'समावर्तन' के प्रधान सम्पादक।

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us