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Satta Aur Samaj (CSDS)

by Dheerubhai Sheth
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350000960
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 514
  • Original Price: INR 750.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 800 grams
  • BISAC Subject(s): Sociology / General

सत्ता और समाज - विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस.डी.एस.) द्वारा प्रायोजित लोक-चिन्तक ग्रन्थमाला की इस दूसरी कड़ी में धीरूभाई शेठ का कृतित्व पेश किया गया है। इस विख्यात राजनीतिक-समाजशास्त्री के जीवन और कृतित्व के बारे में जानना सत्ता और समाज के जटिल रिश्तों पर रोशनी डालने के लिए अनिवार्य हैधीरूभाई शेठ एक ऐसे दुर्लभ बौद्धिक मानस का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके केन्द्रीय स्वर में एक अस्वीकार की ध्वनि है। समाज विज्ञान और सामाजिक यथार्थ के प्रचलित रिश्तों को गहराई से प्रश्नांकित करने वाला यह विपुल अस्वीकार अपने मूल में सकारात्मक है। अपनी इसी ख़ूबी के कारण ही इसके गर्भ से समाज विज्ञान और उसकी पद्धति की रचनात्मक आलोचना निकलती है। इस आलोचना का दायरा बहुत बड़ा है जिसके एक सिरे पर अगर हमारी राजनीतिक आधुनिकता और जातिप्रथा के बीच के लेन-देन का अध्ययन है, तो उसके दूसरे सिरे पर उदारतावादी लोकतंत्र और भूमण्डलीकरण के अन्तःसम्बन्धों की निष्पत्तियों का खुलासा है। इन दोनों सिरों के बीच राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया और उसकी उलझनें, सेकुलरवाद की विवेचना, आरक्षण नीति की अनिवार्यता और उसमें आई विकृतियों के निराकरण और गैर-पार्टी राजनीति के चमकदार सूत्रीकरण मौजूद हैं। इस अनूठे रचना-संसार को एक सूत्र में बाँधने की भूमिका ख़ामोशी से की गयी उस आजीवन विकल्प साधना ने निभायी है जिसके आधार में धीरूभाई की शख्सियत है।

धीरूभाई शेठ - विख्यात राजनीतिक समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर धीरूभाई शेठ आजीवन समाज विज्ञान को भारतीय देह और आत्मा देने के प्रयासों के लिए समर्पित रहे हैं। सिर्फ़ किताबों की दुनिया में वक़्त गुज़ारने या सैद्धान्तिक अध्ययन में डूबे रह कर उनकी यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकती थी। इसके लिए जीवन और जगत को समझने की एक विशिष्ट दृष्टि का विकास ज़रूरी था। जहाँ तक अकादमीय सामग्री का सवाल था, वह तो सभी के लिए उपलब्ध थी। लेकिन, ऐसा क्या था जिसने उसी अकादमीय सामग्री का अनुशीलन करते हुए इस समाज वैज्ञानिक के मन में एक सतत बौद्धिक विद्रोह का बीजारोपण किया? आख़िर मानवीय चेतना की वे कौन सी संरचनाएँ थीं जिनके कारण उन्हें लगा कि समाज विज्ञान की दुनिया में भारतीय ज़मीन पर थियरी की बात करने वाले लोग महज शाब्दिक कलाबाज़ियाँ खा रहे हैं। वे प्रतिबद्धता, अनुभव या त्याग से जुड़े हुए नहीं हैं, इसलिए उनकी बातें सतही हैं। सामाजिक अनुभव पर आधारित न होने के कारण उनका राजनीतिशास्त्र और समाजशास्त्र प्रामाणिकता की कमी से ग्रस्त है।धीरूभाई की निगाह में समाज विज्ञान की वर्तमान सैद्धान्तिकी पश्चिमी इतिहास और बौद्धिकता की उपज है। वे एक्सपीरिएंशल नॉलेज की धारणा पेश करते हैं जो उनके मुताबिक, "अनुभवसिद्ध ज्ञान से अलग है। उनके अनुसार, अनुभव तो एक व्यक्ति का होता है जिसके आधार पर वह अपनी राय बनाता है और जिसकी सामग्री से उसका परिप्रेक्ष्य बनता है। मैं कहता हूँ कि अनुभव समाज का भी होता है, समुदाय का होता है, उसका इतिहास होता है। समाज विज्ञान की दुनिया में थमाये गये सिद्धान्तों के कारण हम इस पहल की तरफ़ ध्यान नहीं देते, और हमारा अनुभव भी उधार लिया हुआ हो जाता है।"धीरूभाई के कृतित्व का सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि उन्होंने न केवल इस तरह के अहम सवाल उठाये, बल्कि उनके ठोस जवाब देने के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर उपाय भी किये हैं। वे देश के कुछ गिने-चुने समाज वैज्ञानिकों में से एक हैं जिन्होंने नियोजनपूर्वक समाज विज्ञान को समाज के अनुभव से जोड़ने की कोशिश की। इसके लिए उन्हें ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को समाज विज्ञान की तक़रीबन वर्चुअल दुनिया से जोड़ने का भागीरथ प्रयास करना पड़ा। उन्होंने समाज विज्ञान की स्थापित विधियों में एक नयी विधि का समावेश किया। यह थी डायलॉग यानी संवाद की विधि।इसके अलावा धीरूभाई ने अपने विमर्श से अकादमीय क्षेत्रों में जातिप्रथा के बारे में प्रचलित समझ पर नयी रोशनी डाली और उसे छुआछूत के एक मौलिक सिद्धान्त को सूत्र बद्ध करने की मंज़िल तक ले जाने में कामयाबी हासिल की। उन्होंने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अपने सदस्यता काल का रचनात्मक इस्तेमाल करते हुए आरक्षण के पचास साल अनुभव का निचोड़ पेश किया जो अध्ययन के लिहाज से इस क्षेत्र की एक उपलब्धि है। इसके अलावा धीरूभाई की रचनाशीलता राष्ट्र, जातीयता, राजनीतिक संरचनाओं, दलीय प्रणाली, भाषा विवाद, भारतीय रेडिकलिज्म, साम्प्रदायिकता, सेकुलरवाद, मानवाधिकार आन्दोलन और ग्रासरूट थियरी जैसी विषयवस्तुओं पर अन्यतम प्रकाश डालने के लिए भी जानी जाती है।

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