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Satta Ke Samne

by Mukesh Bhardwaj
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789389563979
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 224
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 450 grams
  • BISAC Subject(s): History & Theory

यह किताब तब आ रही है जब इक्कीसवीं सदी को बीसवाँ साल लग गया। पिछले साल 'जनसत्ता' में 'बेबाक बोल' स्तम्भ 'चुनावी पाठ' के साथ शुरू किया था। 2014 के आम चुनावों में नरेन्द्र मोदी की अगुआई में भाजपा की प्रचण्ड जीत ने भारतीय राजनीति को एक प्रयोगशाला सरीखा बना दिया। देश की संसद में तीन तलाक़ को आपराधिक बनाने से लेकर कश्मीर में अनुच्छेद 370 का खात्मा करने जैसे मज़बूत राजनीतिक फ़ैसले हुए। नोटबन्दी और जीएसटी जैसे फ़ैसलों को केन्द्र? सरकार सही बता ही रही थी। इन सबके बीच मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने जो असन्तोष का सन्देश दिया वह चौंकाने वाला था। नरेन्द्र मोदी, जनता और विपक्ष की तिकडी को समझने में जो हमने चुनावी पाठ शुरू किया वह 2019 के इक्कीसवें पाठ में 'जो जीता वही नरेन्द्र' के साथ चौंकाने वाला नतीजा लेकर आया। नरेन्द्र मोदी की अगुआई में पचास साल बाद किसी गैर-कांग्रेसी दल ने लगातार दो लोकसभा चुनावों में बहुमत के साथ आम चुनाव जीता। इस लोकसभा चुनाव में भारतीय जनमानस में वह राष्ट्रीय भाव दिखा जो अब तक ख़ारिज किया जाता रहा। चुनावी पाठ का सार था कि जनता ही नरेन्द्र मोदी के पक्ष में लड़ी थी। इसके साथ ही यह तय हो गया था कि लोकसभा चुनावों में छवि-बोध की जंग में कांग्रेस बुरी तरह हार चुकी है। इस किताब का सार तो नरेन्द्र मोदी की दूसरी प्रचण्ड जीत ही है। लेकिन इस किताब के छापेखाने में जाने के साथ ही महाराष्ट्र और झारखण्ड का सन्देश भी है कि जनता केन्द्र और राज्य के मुद्दों को अलग-अलग देखना सीख चुकी है और क्षेत्रीय क्षत्रपों की समय-समाप्ति का ऐलान बहत जल्द ख़ारिज हो गया। राजनीतिक टिप्पणीकारों के लिए जनता ने 2019 को बहुत ही चुनौती भरा बना दिया। सत्ता और जनता के रिश्ते को समझने की यह कोशिश जारी रहेगी।

मुकेश भारद्वाज नब्बे के दशक का वह दौर जब नागरिक की पहचान उपभोक्ता के रूप में हो रही थी और राष्ट्र राज्य एक बड़ा बाज़ार बन रहा था तब बतौर एक पत्रकार सत्ता के शीर्ष से लेकर हाशिए पर बैठे अन्तिम आदमी तक संवाद का मौका मिला। सत्ता का शीर्ष हाशिए को कैसे देखता है और हाशिए पर पड़े की सत्ता से क्या उम्मीद है, इसी को समझने और लिखने का इंडियन एक्सप्रेस समूह ने मौका दिया। इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में काम करने का एक सुकून यह रहा कि नौकरी और जुनून दोनों में ख़ास फ़र्क नहीं रहा। 1988 में जनसत्ता में बतौर ट्रेनी शुरुआत, फिर इंडियन एक्सप्रेस के लिए पत्रकारिता और 2006 में जनसत्ता चण्डीगढ़ का स्थानीय सम्पादक बनने की कड़ी में अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी काम करने का मौका मिला। हिन्दी में काम करने की शुरुआत ने हाशिए पर से सत्ता को समझने का नया नज़रिया दिया। यह सच है कि जब आप जनता की भाषा में पत्रकारिता करते हैं तो उस समाज और संस्कृति को लेकर तमीज़दार होते हैं जिसका आप हिस्सा हैं। अनुभव यही रहा कि पत्रकारिता एक ऐसी विधा है जिसमें आप जब तक विद्यार्थी बने रहेंगे ज़िन्दा रहेंगे और इसमें मास्टरी होने की ख़ुशफ़हमी ही आपको इससे बेदखल कर देगी। पिछले कुछ समय से समाज और राजनीति के नये ककहरे से जूझने की जद्दोजहद जारी है। आज संचार माध्यमों का सर्वव्यापीकरण हो चुका है। कुछ भी स्थानीय और स्थायी नहीं रह गया है। भूगोल और संस्कृति पर राजनीति हावी है। एक तरफ़ राज्य का संस्थागत ढाँचा बाज़ार के खम्भों पर नया-नया की चीख़ मचाये हुए है तो चेतना के स्तर पर नया मनुष्य पुराना होने की ज़िद पाले बैठा है। जनसत्ता के कार्यकारी सम्पादक और पत्रकार होने के नाते 2014 के बाद की दिल्ली और देश को जितना सीखा और समझा वह संकलित होकर चार किताबें सत्ता की नज़र, सत्ता का सत्य, नोटबन्दी : नकद नारायण कथा और सत्ता से संवाद के रूप में आ चुकी हैं।

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