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Saundarya Tatv Vimarsh

by S.T. Narsimhachari
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350002551
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 271
  • Original Price: INR 475.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 600 grams
  • BISAC Subject(s): General

सौन्दर्य तत्त्व विमर्श - लेखक द्वारा 2002-2004 के दौरान 'तेलुगु साहित्य का इतिहास' लिखने के प्रयासों का ही फल हैं ये निबन्धात्मक पुस्तक। सामान्यतः जब दूसरी भाषा के साहित्य का इतिहास लिखा जाता है तब नाम, साहित्य, ऐतिहासिक सन्दर्भ और वर्गीकरण पर बल दिया जाता है। अधिकांशतः इतिहास लिखने वाला दूसरी भाषा के साहित्य की गहराइयों से परिचित नहीं होता। नरसिम्हाचारी जी हिन्दी में सौन्दर्यशास्त्र के अद्वितीय आलोचक होने के साथ-साथ तेलुगु साहित्य के भी आलोचक थे। उन्होंने बहुत से आलोचनात्मक निबन्ध लिखे। ये सभी निबन्ध निर्वाक शैली व पैने तेवरों से युक्त हैं। आचार्य नरसिम्हाचारी तेलुगु साहित्य अकादमी सहित अनेक मंचों से जुड़े रहे।इन निबन्धों में चर्चित निबन्धकारों का चयन काफ़ी रोचक है। इनमें से कई निबन्धकारों को तेलुगु साहित्य की महान हस्तियाँ नहीं माना जाता, और न ही तेलुगु साहित्य के समग्र प्रतिनिधि। अधिकांश भारतीय भाषाओं की तरह तेलुगु आलोचना में भी प्रगतिवादी लेखकों की प्रशंसा और अन्य की उपेक्षा की जाती है। श्री नरसिम्हाचारी जी ने अपने दृष्टिकोण को समतल परन्तु विशिष्ट सौन्दर्यशास्त्रीय रखा है और लेखकों का चयन उनकी सौन्दर्यात्मकता का ही फल है।

एस. टी. नरसिम्हचारी - जन्म : 8 अक्टूबर, 1927, काकिनाडा, आन्ध्र प्रदेश।शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।अध्यापन : 87 वर्ष स्नातकीय एवं स्नातकोत्तरीय विभागों में सेवा के बाद 1987 में आचार्य श्रीवेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति से सेवानिवृत्त।रचनाएँ: 1. प्रसाद की कहानियाँ प्रवृत्तिमूलक विश्लेषण।2. सौन्दर्यतत्त्व-निरूपण (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा पुरस्कृत)3. सूर की सौन्दर्य-चेतना (केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का पुरस्कार)4. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल साहित्यिक अभिरुति और रस संवेदना (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का सौहार्द पुरस्कार प्राप्त)5. सौन्दर्यशास्त्रीय समीक्षा और रसज्ञता की प्राप्ति6. तेलुगु साहित्य : सन्दर्भ और समीक्षा7. साहित्यिक अभिरुचि और समीक्षाअभिरुचि : गुरुदेव आचार्य केशवप्रसाद मिश्र के द्वारा साहित्यिक विवेक, सहृदयता आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की समीक्षाओं के अध्ययन से साहित्यिक प्रवृत्तियों में गहरी पैठ का विकास पाश्चात्य एवं भारतीय दृष्टियों से सौन्दर्यशास्त्र के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक पक्षों के अनुशीलन में विशेष अभिरुचि साहित्य के सम्बन्ध में उदारतावादी तथा वाद-निरपेक्ष दृष्टिकोण साहित्य-सर्जना 'स्वान्तः सुखाय' आत्माभिव्यक्ति होने पर भी सामाजिक भाव-विचारों के संक्रमण के माध्यम, भाषा में प्रकाशन से सम्प्रेषण की समस्या का समाधान और आत्माभिव्यक्ति का सामाजिक चेतना के साथ सम्बन्ध स्थापन एवं भावयोग। साहित्य जीवन सापेक्ष और उसके विविध पहलुओं का अभिव्यंजक है, पर साहित्य की प्रकृति तथा परिधि में ही। साहित्य की अन्य शास्त्रों की तरह अपनी स्वतन्त्र सत्ता है - "नियतिकृतनियम रहिता अनन्य परतन्त्रां।"

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