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Shabdon Ke Digvijay

by Rajkumar Digvijay
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789371123037
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 126
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

शब्दों के दिग्विजय' राज कुमार दिग्विजय की एक बहुपरतीय कृति है जो व्यंग्य, डायरी, संस्मरण और लेखों से पूरित है। यह संग्रह समकालीन भारतीय समाज की विसंगतियों और विडम्बनापूर्ण यथार्थ का बेबाक, धारदार और व्यंग्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करता है। इस पुस्तक की रचनाओं में एक ऐसा तीव्र आत्मचिन्तन है जो हमारे जीवन, समाज, व्यवस्था, सम्बन्धों और मान्यताओं के उन पहलुओं पर करारी चोट करता है, जिन्हें हमने सहज स्वीकार लिये हैं।पुस्तक के पहले खण्ड 'चिन्तन से चोट' में व्यंग्य-रचनाएँ हैं जो पर्यावरण-विनाश, स्वास्थ्य-शिक्षा की असलियत और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण पर गहरा कटाक्ष करती हैं। 'रामबाण' और 'बुखार अच्छे हैं।' जैसी रचनाएँ जहाँ चिकित्सा-व्यवस्था के बाज़ारूपन पर करारी टिप्पणी करती है, वहीं 'गौरैया अब आँगन में नहीं चहकती' और 'जरूरी है सह-अस्तित्व' में विकास की आँधी में प्रकृति के हास की असह्य तस्वीरें उभरती हैं। 'प्रेम पर कानूनी पहरा' और 'स्वार्थी मानव-निःस्वार्थ प्रेम' हमारे सामाजिक- सांस्कृतिक ढाँचे में पनपती कृत्रिमता और भावनात्मक ठण्डक को उघाड़ती हैं।दूसरे खण्ड 'सोच-विचार' में लेखक ने अपनी व्यंग्य-रचनाओं के जरिये भारतीय समाज की गहराई से पड़ताल की है। 'बहुरि बन्दि खल गन सतिभाएँ' से लेकर 'रंक चले सिर छत्र धराई' तक, हर रचना व्यवस्था, जातिगत विद्रुपताओं, खेती की उपेक्षा और तकनीकी अन्धश्रद्धा की परतें उधेड़ती है। 'कहाँ से आयी जाति-व्यवस्था' और 'टी फ़ॉर टोमेटो' में इतिहास और वर्तमान का ऐसा समन्वय मिलता है जो पाठक को सोचने पर विवश करता है।तीसरे खण्ड 'डायरी के पन्नों से' में आत्मीय और गद्यात्मक शैली में जीवन के विविध पक्षों नशे की सामाजिक सच्चाइयों, स्वास्थ्य की उपेक्षा, जैविक खेती, जल-संकट जैसे गम्भीर विषयों को सहज लेकिन गहरे भाव से प्रस्तुत किया गया है। लेखक का यह डायरी-लेखन अनुभव और आत्ममन्थन का वह सार है, जिससे अपने युग और जगत् का बहुत कुछ जाना-समझा जा सकता है।'कोविड की 'काल' कोठरी से' पुस्तक का चौथा खण्ड है जिसमें सम्मिलित लेख महामारी के भय, भाषाई उलझनों, चिकित्सा घाँधलियों और सामाजिक व्यवहार पर अत्यन्त मार्मिक हैं। लेखक ने भय और बीमारी से कहीं अधिक सामाजिक बेहोशी और नीति-व्यवस्था की नाकामी को उजागर किया है।अन्तिम खण्ड 'यादों के बहाने...' में दो मार्मिक संस्मरण हैं- 'अरुण जेटली' और 'खामोश हो गयी जादुई आवाज'। ये संस्मरण प्रसिद्ध राजनेता अरुण जेटली और रेडियो उद्घोषक अमीन सयानी पर न केवल श्रृद्धांजलि स्वरूप हैं बल्कि उस जीवन-दृष्टि और संवेदनशीलता की दस्तावेज़ हैं, जो आज के समय में विलुप्तप्राय होती जा रही है।इस तरह देखें तो 'शब्दों के दिग्विजय' व्यंग्य सहित अन्य विधाओं से सृजित हमारे समय और समाज का एक आईना है-कहीं धुँधला, कहीं चटख; जो हमें कभी हास्य में रँगते व्यथित करता है और व्यथित करते सोचने पर मजबूर। निस्सन्देह, यह कृति पाठकों को गुदगुदाती ही नहीं, झकझोरती भी है, और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।

राजकुमार दिग्विजयजन्म : सिसवा पटना, पूर्वी चम्पारण, बिहारशिक्षा : प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा-सिसवा पटना एवं मोतिहारी, उच्च शिक्षा : बीएससी (एग्रीकल्चर) बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, गोविंद वल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर, उत्तराखण्ड से "पादप प्रजनन एवं आनुवंशिकी में विज्ञान स्नातकोत्तर उपाधि (एमएससी) "पेशेवर जीवन : अपर महानिदेशक (मानव संसाधन विकास महानिदेशालय, सीबीआईसी, राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार, 2023-24), निजी सचिव (श्री गिरिराज सिंह, माननीय राज्य मंत्री (स्वतन्त्र प्रभार), सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय, भारत सरकार), निजी सचिव (श्री गिरिराज सिंह, माननीय मंत्री, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी, भारत सरकार), संयुक्त एवं अपर निदेशक डीजीआरआई, राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय (2015-18), संयुक्त आयुक्त, दिल्ली कस्टम (2014-2015), उपायुक्त, केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड, राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय, नयी दिल्ली (2014), उपायुक्त, दिल्ली कस्टम (2009-11), सहायक आयुक्त, दिल्ली कस्टम (2009), सहायक आयुक्त, कोलकाता कस्टम (2006-2009)रुचियाँ : जैविक कृषि, आयुर्वेद, प्राकृतिक उपचार, पर्यावरण, लोक प्रशासन, क्रिकेट, तथा सामान्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों में गहरी अभिरुचि(भारतीय राजस्व सेवा के एक चिन्तनशील, सरल, समर्पित, कर्मठ, दूरदर्शी अधिकारी के रूप में स्थापित रहे। उनके व्यक्तित्व के मानवीय संस्पशों से शायद ही समाज का कोई भी वर्ग अछूता रहा हो।)

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