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Sharanam

by Narendra Kohli
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352292509
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 224
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

शरणम् का नेपथ्यकोई नयी पुस्तक प्रकाशित होती है तो प्रायः लेखक से पूछा ही जाता है कि उसने वह पुस्तक क्यों लिखी। वही विषय क्यों चुना? मैं भी मानता हूँ कि बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। किन्तु सृजन के क्षेत्र में यह मामला इतना स्थूल नहीं होता। इसलिए मुझे तो सोचना पड़ता है कि पुस्तक मैंने लिखी या पुस्तक मुझसे लिखी गयी । विषय मैंने चुना अथवा विषय ने मुझे चुना? मैं रहस्यवादी होने का प्रयत्न नहीं कर रहा हूँ किन्तु सृजन का क्षेत्र मुझे कुछ ऐसा ही लगता है।गीता को मैंने पहली बार शायद अपने विद्यालय के दिनों में कुछ न समझते हुए भी पढ़ने का प्रयत्न किया था। कारण? मेरा स्वभाव है कि मैं जानना चाहता हूँ कि कोई पुस्तक महत्त्वपूर्ण क्यों मानी जाती है। तो गीता को भी पढ़ने का प्रयत्न किया, समझ में आये या न आये। उसके पश्चात् अनेक विद्वानों की टीकाएँ और भाष्य पढ़ने का प्रयत्न किया । किन्तु “महासमर” लिखते हुए मन में आया कि मूल गीता को एक बार संस्कृत में भी अवश्य पढ़ना चाहिए। तब डॉ. कृष्णावतार से भेंट हो गयी। उनसे गीता पढ़ी। महासमर लिखा गया।किन्तु इधर मेरे अपने परिवार में यह प्रस्ताव रखा गया कि हम अपने बच्चों के साथ बैठ कर गीता पढ़ें। हम सब जानते थे कि बच्चों की समझ में यह विषय नहीं आयेगा और वे सोते भी रह सकते हैं। फिर भी एक दिन में पाँच श्लोकों की गति से हमने गीता पढ़ी। पढ़ाने वाला था मैं, जिसे स्वयं न संस्कृत भाषा का ज्ञान है, न गीता के दर्शन और चिन्तन का। फिर भी हम पढ़ते रहे। मैंने पहली बार अनुभव किया कि पढ़ने से कोई ग्रन्थ उतना समझ में नहीं आता, जितना कि पढ़ाने से आता है।पढ़ाते हुए व्यक्ति समझ जाता है कि उसे क्या समझ में नहीं आ रहा है। फिर श्रोता प्रश्न भी करते हैं। मेरा छोटा पोता जो केवल तेरह वर्षों का है, कुछ अधिक गम्भीर था। वह सुनता भी था और मन में उठे बीहड़ प्रश्न भी पूछता था ।प्रश्न उसके हों अथवा मेरे अपने मन के, वे मेरे मन में गड़ते चले गये। मेरा अनुभव है कि मन में जो प्रश्न उठते हैं, मन निरन्तर उनके उत्तर खोजता रहता है। चेतन ढंग से भी और अचेतन ढंग से भी। और वे उत्तर ही मुझसे उपन्यास लिखवा लेते हैं।... इस बार भी वही हुआ। वे प्रश्न मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते रहे। अपना उत्तर खोजते रहे।... किन्तु सबसे बड़ी समस्या थी कि मुझे उपन्यास लिखना था । मैं उपन्यास ही लिख सकता हूँ और पाठक उपन्यास को पढ़ता भी है और समझता भी है। मैं जानता था कि यह कार्य सरल नहीं था। गीता में न कथा है, न अधिक पात्र। घटना के नाम पर बस विराट रूप के दर्शन हैं। घटनाएँ नहीं हैं, न कथा का प्रवाह है। संवाद हैं, वह भी नहीं, प्रश्नोत्तर हैं, सिद्धान्त हैं, चिन्तन है, दर्शन है, अध्यात्म है। उसे कथा कैसे बनाया जाए ?किन्तु उपन्यासकार का मन हो तो उपन्यास ही बनता है, जैसे मानवी के गर्भ में मानव सन्तान ही आकार ग्रहण करती है। टुकड़ों-टुकड़ों में उपन्यास बनता रहा। पात्रों के रूप में संजय और धृतराष्ट्र तो थे ही; हस्तिनापुर में उपस्थित कुन्ती भी आ गयी, विदुर और उनकी पत्नी भी आ गये। गान्धारी और उसकी बहुएँ भी आ गयीं । द्वारका में बैठे वसुदेव, देवकी, रुक्मिणी और उद्धव भी आ गये। उपन्यासकार जितनी छूट ले सकता है, मैंने ली। किन्तु गीता के मूल रूप से छेड़-छाड़ नहीं की। मैं गीता का विद्वान् नहीं हूँ, पाठक हूँ। उपन्यासकार के रूप में जो मेरी समझ में आया, वह मैंने अपने पाठकों के सामने परोस दिया।तो इसे धर्म अथवा दर्शन का ग्रन्थ न मानें। यह गीता की टीका अथवा उसका भाष्य भी नहीं है। यह एक उपन्यास है, शुद्ध उपन्यास, जो गीता में चर्चित सिद्धान्तों को उपन्यास के पाठक के सम्मुख उसके धरातल पर ही प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता

नरेन्द्र कोहलीजन्म : 6 जनवरी, 1940कालजयी कथाकार एवं मनीषी डॉ. नरेन्द्र कोहली की गणना आधुनिक हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में होती है। कोहली जी ने साहित्य की सभी प्रमुख विधाओं (उपन्यास, व्यंग्य, नाटक, कहानी) एवं गौण विधाओं (संस्मरण, निबन्ध, पत्र आदि) और आलोचनात्मक साहित्य में अपनी लेखनी चलायी। हिन्दी साहित्य में 'महाकाव्यात्मक उपन्यास' की विधा को प्रारम्भ करने का श्रेय नरेन्द्र कोहली को ही जाता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्रों की गुत्थियों को सुलझाते हुए उनके माध्यम से आधुनिक समाज की समस्याओं एवं उनके समाधान को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना नरेन्द्र कोहली की अन्यतम विशेषता है। नरेन्द्र कोहली सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-शैली एवं दर्शन का सम्यक् परिचय करवाया है 1 रचनाएँ : अभ्युदय (दो भाग), महासमर 1: बन्धन, महासमर 2 : अधिकार, महासमर 3 : कर्म, महासमर 4 : धर्म, महासमर 5 : अन्तराल, महासमर 6 : प्रच्छन्न, महासमर 7 : प्रत्यक्ष, महासमर 8 : निर्बन्ध, महासमर 9 : आनुषंगिक, महासमर (रजत संस्करण-9 खण्डों में), महासमर (विशेष संस्करण-9 खण्डों में ही उपलब्ध), सैरन्ध्री, न भूतो न भविष्यति (व्यास सम्मान 2013), मत्स्यगन्धा, हिडिम्बा, कुन्ती, मेरे राम : मेरी रामकथा, पुनरारम्भ, अवसर, दीक्षा, संघर्ष की ओर, युद्ध (दो भाग), देश के हित में, सागर-मन्थन (उपन्यास); हम सबका घर (बाल उपन्यास); समग्र कहानियाँ (दो भाग); व्यंग्य गाथा (दो भाग), मुहल्ला, वह कहाँ है, सबसे बड़ा सत्य, हुए मर के हम जो रुसवा, नामचर्चा, देश के शुभचिन्तक, त्राहि-त्राहि, इश्क़ एक शहर का, राम लुभाया कहता है, आयोग, सपने में आये तीन परिवार, गणतन्त्र का गणित, किसे जगाऊँ, प्रतिनाद, स्मरामि (व्यंग्य); किष्किन्धा, अगस्त्य कथा (नाटक); हिन्दी उपन्यास : सृजन और सिद्धान्त, प्रेमचन्द (आलोचना); जहाँ है धर्म वहीं है जय, नरेन्द्र कोहली ने कहा (विचार-लेख)। सम्मान : पद्मश्री सम्मान, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान, पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्मान, अट्टहास सम्मान।निधन : 17 अप्रैल, 2021

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