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Shiksha, Darshan Aur Samaj: Samkalin Vimarsh

by Chief Editor : Dayanidhi Mishra
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789389563412
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 288
  • Original Price: INR 695.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 500 grams
  • BISAC Subject(s): General

भारतीय ज्ञान परम्परा में परा और अपरा विद्याओं और वेद-वेदांग सहित विविध प्रकार के दर्शनों के साथ सर्वांगपूर्ण शिक्षा की अवधारणा, ज्ञान की पद्धति तथा उसके संसाधनों की विस्तारपूर्वक व्यवस्था की गयी थी। धीरे-धीरे यह परम्परा दुर्बल होती गयी। अंग्रेज़ी उपनिवेशकाल में शिक्षा का जो कायापलट हुआ उसने शिक्षा और उसके द्वारा भारतीय मानस की बनावट और बुनावट को गहनता से प्रभावित किया। उसने शिक्षा के अमृत वृक्ष को उखाड़ फेंका और ज्ञान की गवेषणा करने वाले जिज्ञासु की जगह अर्थपिपासु की परम्परा स्थापित की। समृद्ध भारतीय ज्ञान परम्परा को निरस्त करते हुए भारतीय चेतना में पाश्चात्य ज्ञान की श्रेष्ठता को स्थापित किया गया। उपेक्षा और अनुपयोग के कारण भारतीय ज्ञान परम्परा अधिकांश भारतीयों के लिए अपरिचित और अप्रासंगिक-सी होती गयी। उसके प्रति दुर्भाव भी पनपने लगा और उसे तिरस्कृत किया जाने लगा। इसके स्थान पर राजनीतिक पसन्द और नापसन्द के अनुसार शिक्षा में यथासमय विविध प्रकार के परिवर्तन और प्रयोग किये जाते रहे। आज शिक्षा भाराक्रान्त-सी होती जा रही है और उसमें सामर्थ्य की दृष्टि से सार्थक बदलाव नहीं आ सका है।

पं. विद्यानिवास मिश्र (1926-2005) हिन्दी और संस्कृत के अग्रणी विद्वान, प्रख्यात निबंधकार, भाषाविद् और चिन्तक थे। आपका जन्म गोरखपुर जिले के ‘पकड़डीहा’ ग्राम में हुआ। प्रारम्भ में सरकारी पदों पर रहे। तत्पश्चात् गोरखपुर विश्वविद्यालय, आगरा विश्वविद्यालय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ और फिर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, आचार्य, निदेशक, अतिथि आचार्य और कुलपति के पदों को सुशोभित किया। कैलिफोर्निया और वाशिंगटन विश्वविद्यालयों में अतिथि प्रोफेसर एवं ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान सम्पादक भी रहे। अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए आप भारतीय ज्ञानपीठ के ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’, के.के. बिड़ला फाउंडेशन के ‘शंकर सम्मान’, उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के सर्वोच्च ‘विश्व भारती सम्मान’, भारत सरकार के ‘पद्मश्री’ और ‘पद्मभूषण’, ‘भारत भारती सम्मान’, ‘महाराष्ट्र भारती सम्मान’, ‘हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार’, साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्यता’, हिन्दी साहित्य सम्मेलन से ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ तथा उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी से ‘रत्न सदस्यता सम्मान’ से सम्मानित किये गये और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। बड़ी संख्या में प्रकाशित आपकी पुस्तकों में व्यक्ति-व्यंजक निबन्ध संग्रह, आलोचनात्मक तथा विवेचनात्मक कृतियाँ, भाषा-चिन्तन के क्षेत्रा में शोधग्रन्थ और कविता संकलन सम्मिलित हैं।

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