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Shyam Ki Maa

by Sane Guruji
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789351863960
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 232
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 191 grams
  • BISAC Subject(s): General

वर्ष 1950-60 के दशक में भारत की जिस पीढ़ी ने अपनी उम्र का पहला डेढ़ दशक पूरा किया था, उनमें से आज का कोई वरिष्ठ नागरिक ऐसा नहीं होगा, जिसने बचपन में साने गुरुजी की मराठी में लिखी ‘श्यामची आई’ पुस्तक पढ़ी नहीं होगी। साने गुरुजी के ‘श्यामची आई’और ‘मीरी’ जैसे मराठी में लिखे उपन्यास पढ़कर जिसकी आँखें नम न हुई हों, ऐसे व्यक्ति कम ही होंगे। बेहद सरल, मार्मिक, दिल को छू लेनेवाली भाषा साने गुरुजी की विशेषता है।कहा जा सकता है कि माँ की प्रेममय और महान् सीख का सरल, सहज और सुंदर शब्दों में किया गया चित्रण, हमारी संस्कृति का एक अनुपमेय कथात्मक चित्र, एक कारुणिक कथावस्तु यानी ‘श्याम की माँ’! खुद गुरुजी कहते हैं कि मन का पूरा अपनापन मैंने इस कथा में उडे़ला है। ये कहानियाँ लिखते हुए सौ बार मेरी आँखें नम हुईं। दिल भर आया। मेरे हृदय में माँ के बारे में जो अपार प्रेम, भक्ति और कृतज्ञता का भाव है, वह ‘श्याम की माँ’ पढ़कर अगर पाठकों के मन में भी उत्पन्न हो तो कहा जा सकता है कि यह कृति लिखना सार्थक हुआ।अपने बच्चों से अपार प्रेम करनेवाली, वे सुंसस्कारी बनें, इसलिए जी-जान से कोशिश करनेवाली, लेकिन संस्कारों की अमिट छाप उपदेश रूपी दवा की खुराक के रूप में नहीं, बल्कि अपने बरताव से और रोजमर्रा के छोटे-छोटे प्रसंगों के जरिए बच्चों के मन पर छोड़नेवाली, अनुशासन का महत्त्च बताते हुए प्रसंगानुसार कठोर बननेवाली यह आदर्श माँ आज की उदयोन्मुख पीढ़ी के लिए ही नहीं, वरन् उनके माता-पिता के लिए भी निश्चित रूप से प्रेरक साबित होगी।

पांडुरंग साने गुरुजी का जन्म 24 दिसंबर, 1899 को महाराष्ट्र के रत्नगिरि जिले के पालगढ़ कस्बे में हुआ। इनके पिताजी सदाशिव साने तथा माताजी यशोदाबाई साने थीं। उनके जीवन पर उनकी माँ की शिक्षा का बहुत प्रभाव पड़ा। शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने अमलनेर में ही शिक्षक के पद पर काम किया। यहीं पर छात्रावास की जिम्मेदारी सँभालते हुए उन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली। उन्होंने छात्रावास में छात्रों को अपने जीवन में स्वावलंबन का पाठ पढ़ाया। अमलनेर में उन्होंने तत्त्वज्ञान मंदिर में तत्त्वज्ञान की शिक्षा ली। सन् 1928 में उन्होंने ‘विद्यार्थी’ नाम से मासिक प्रारंभ किया। उन पर महात्मा गांधी के विचारों का बहुत प्रभाव रहा। वे खादी के कपड़े पहनते थे। सन् 1930 में उन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया तथा स्वाधीनता की लड़ाई में सतत संघर्षशील रहे।स्मृतिशेष :11 जून, 1950।अनुवादकलेखन क्षेत्र (हिंदी) में आने से पूर्व संध्या पेडणेकर ने शिक्षा और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काम किया। हिंदी और मराठी में प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थानों से कई अनुवादित पुस्तकें प्रकाशित। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानियाँ, कविताएँ, अनुवाद आदि प्रकाशित।

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