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Siddhant Aur Adhyayan

by Babu Gulab Rai
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789362878397
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 304
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

सिद्धान्त और अध्ययन - मेरे ‘नवरस' में अन्य अन्य काव्यांगों का वर्णन केवल प्रसंग वश ही हुआ है। यह पुस्तक और इसका दूसरा भाग-'काव्य के रूप' इस दृष्टि से लिखे गये हैं कि विद्यार्थियों को काव्यांगों, रस, रीति, लक्षणा, व्यंजना, अलंकारों आदि का सामान्य परिचय हो जाये और उनका काव्य में स्थान समझ में आ जाये। उसी के साथ वे वर्तमान साहित्यिक समस्याओं और वादों से भी अवगत हो जायें। इनमें पूर्व और पश्चिम के मतों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। किन्तु इनमें वर्णित सिद्धान्तों का (कम-से-कम पहले भाग का) मूल स्रोत भारतीय साहित्य-शास्त्र है। समालोचना के प्रकार और सिद्धान्त अवश्य विदेशी परम्परा से प्रभावित हैं। पहले भाग में काव्य के सिद्धान्त हैं और उन सिद्धान्तों को भारतीय साहित्य के अध्ययन से उदाहरण देकर पुष्ट किया गया है। दूसरे भाग में काव्य के विभिन्न रूपों का वर्णन है। इसमें उनके सैद्धान्तिक विवेचन के साथ उनका हिन्दी भाषा में विकास भी दिखाया गया है। ये दोनों भाग मिलकर साहित्यालोचन का पूरा क्षेत्र व्याप्त कर लेते हैं। सिद्धान्त और अध्ययन में भारतीय साहित्य-सिद्धान्तों के दिग्दर्शन के साथ पाश्चात्य विद्वानों के मतों का यथेष्ट निरूपण है। सिद्धान्त और अध्ययन वास्तव में बाबूजी के संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य-सिद्धान्तों के गम्भीर अध्ययन का सुपरिणाम है। बाबूजी की भारतीय साहित्य-चिन्तना पर श्रद्धा थी, गर्व था किन्तु पाश्चात्य मत-सिद्धान्तों की महत्ता एवं प्रेरणा को भी वे अस्वीकार नहीं कर सके; इनकी ओर उनका सजग अनुराग था। इसी कारण इस पुस्तक में प्राचीन सिद्धान्तों पर नवीन आलोक डालने तथा नवीन सिद्धान्तों का भी समावेश करने की उनकी समन्वयवादी प्रवृत्ति रही । यह पुस्तक जहाँ लेखकों, कवियों तथा उच्च श्रेणी के विद्यार्थियों के लिए विशेष उपयोगी है वहाँ आलोचना-साहित्य के अध्येता और मर्मज्ञ भी इससे यथोचित लाभ प्राप्त कर सकेंगे।- इसी पुस्तक से

बाबू गुलाबराय का जन्म इटावा, उत्तर प्रदेश में हुआ । उनके पिता श्री भवानी प्रसाद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनकी माता भी कृष्ण की उपासिका थीं और सूर, कबीर के पदों को तल्लीन होकर गाया करती थीं। माता-पिता की इस धार्मिक प्रवृत्ति का प्रभाव बाबू गुलाबराय जी पर भी पड़ा। गुलाबराय जी की प्रारम्भिक शिक्षा मैनपुरी में हुई। तहसीली स्कूल के पश्चात उन्हें अंग्रेज़ी शिक्षा के लिए जिला विद्यालय भेजा गया। एंट्रेंस परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने आगरा कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा पास की। दर्शनशास्त्र में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात गुलाबराय जी छतरपुर चले गये और वहाँ के महाराज के निजी सचिव हो गये। इसके बाद वे वहाँ दीवान और चीफ़ जज भी रहे। छतरपुर महाराजा के निधन के पश्चात गुलाबराय जी ने वहाँ से अवकाश ग्रहण किया और आगरा आकर रहने लगे। आगरा आकर उन्होंने सेंट जॉन्स में हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद पर कार्य किया। गुलाबराय जी अपने जीवन के अन्तिम काल तक साहित्य - साधना में लीन रहे । उनकी साहित्यिक सेवाओं के फलस्वरूप आगरा विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट. की उपाधि से सम्मानित किया । सन् 1963 में आगरा में उनका स्वर्गवास हो गया ।गुलाबराय जी ने मौलिक ग्रन्थों की रचना के साथ-साथ अनेक ग्रन्थों का सम्पादन भी किया है । उनकी कृतियाँ इस प्रकार हैं- आलोचनात्मक रचनाएँ: नवरस, हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास, हिन्दी नाट्य विमर्श, आलोचना कुसुमांजलि, काव्य के रूप, सिद्धान्त और अध्ययन आदि; दर्शन सम्बन्धी : कर्तव्य शास्त्र, तर्क शास्त्र, बौद्ध धर्म, पाश्चात्य दर्शनों का इतिहास, भारतीय संस्कृति की रूपरेखा; निबन्ध-संग्रह : प्रकार प्रभाकर, जीवन- पशु, ठलुआ क्लब, मेरी असफलताएँ, मेरे मानसिक उपादान आदि; बाल साहित्य : विज्ञान वार्ता, बाल प्रबोध आदि; सम्पादन ग्रन्थ : सत्य हरिश्चन्द्र, भाषा-भूषण, कादम्बरी कथा - सार आदि ।इनके अतिरिक्त गुलाबराय जी की बहुत-सी स्फुट रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं ।

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