Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Stree-Mukti Ki Samajiki : Madhyakal Aur Navjagaran

by Anamika
Save 30% Save 30%
Current price ₹175.00
Original price ₹250.00
Original price ₹250.00
Original price ₹250.00
(-30%)
₹175.00
Current price ₹175.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789395737333
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 168
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 159 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

आज भी स्त्रीवाद के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य यही है कि वह मनुष्य मात्र में स्त्री-दृष्टि का विकास करे। यह सिर्फ़ स्त्रियों की अपनी मुक्ति का मसला नहीं है, पुरुष को भी उन जकड़बदियों से मुक्त होने की ज़रूरत है जो एक तरफ़ उसे शक्ति देती हैं कि वह किसी को बाँध सके तो दूसरी तरफ़, ख़ुद उसे भी एक चौखटे में जड़ देती हैं।

बहुत कुछ बदला है, बहुत कुछ बदलने-बदलने को है। संस्थाओं-प्रतिष्ठानों का पौरुष ढीला पड़ा है और स्त्री-तत्व के प्रवाह के लिए परिवार से लेकर राष्ट्र तक, सभी जगह नए झरोखों-रास्तों ने जन्म लिया है। ख़ासतौर से लेखन में स्त्री का स्वर निर्णायक भंगिमा और अपनी विशिष्ट पहचान के साथ उभरकर आया है। स्त्री ने निसंकोच भाव से अपनी एक भाषा गढ़ी है, आलोचना की अपनी प्रविधियाँ विकसित की हैं, उन विशेषताओं को जाना है जो उसे एक बेहतर मनुष्य बनाती हैं और यह भी समझा है कि उसका होना संसार के लिए कितना ज़रूरी है। लेकिन उसका सहगामी और अब तक वर्चस्व का केन्द्र रहा पुरुष भी क्या उतना ही बदला है? और क्या स्त्री का यह आत्मविश्वास अचानक हुई कोई घटना है या पीछे इतिहास में शुरू हुई किसी लम्बी प्रक्रिया का प्रतिफल? 

‘स्त्री-मुक्ति की सामाजिकी : मध्यकाल और नवजागरण’ हिन्दी के मध्यकालीन काव्य तथा सामाजिक सौन्दर्यबोध के पुनर्पाठ के माध्यम से इसी प्रक्रिया का लेखा-जोखा करने की कोशिश करती है। मध्यकाल और पुनर्जागरण के दौर की रचनाओं, रचनाकारों और दूर भविष्य तक को प्रभावित करने वाली प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए यह किताब स्त्री-विमर्श के उदात्त पक्षों का अन्वेषण और समय तथा समाज की सीमाओं का आकलन दोनों करती है। 

मध्यकालीन नायिकाओं और स्त्री-रचनाकारों की विनोद-वृत्ति जो उनकी आन्तरिक मुक्ति की ही एक भंगिमा थी; रहीम की ‘नगर शोभा’ में स्त्रियों का चित्रण और उसकी सामाजिकी; स्त्री भक्त-कवियों का अस्मिताबोध और आधुनिक स्त्री-दृष्टि से रीतिकाल के पुनर्पाठ से लेकर मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में आई स्त्री तक, अनामिका ने इस पुस्तक में अपनी रस-सिद्ध आलोचना-शैली में एक पूरे युग का जायज़ा लिया है।

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us