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Sumanglam Se Shraddhanjali Tak

by Suryapal Shukla
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170557159
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 228
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 400 grams
  • BISAC Subject(s): General

सुमंगलम् से श्रद्धांजलि तक - सुमंगलम् से श्रद्धांजलि तक एक परिवार की इतिहास-गाथा नहीं बल्कि परिवार के बहाने ऐसा सामाजिक आख्यान रचने का प्रयास लेखक ने किया है जिसके द्वारा हम व्यक्ति के माध्यम से उसके समय और समाज को समझ सकते हैं।इसके लिए लेखक डॉ. सूर्यपाल शुक्ल ने इस विवरणात्मक रचना में ब्यौरों का रचनात्मक इस्तेमाल किया है। इनमें कहीं भी नीरसता या बोझिलता नहीं है बल्कि प्राचीन आख्यानों सरीखा कथारस है जो आद्यन्त बाँधकर रखता है। तथ्यों की विवरण शैली में यह प्रस्तुति लेखक के जीवन के विशेष काल खंड का चित्रण मात्र नहीं है बल्कि पूर्वोत्तर के सम्मोहित करते सौन्दर्य से हार्दिक परिचय करानेवाली रचना सम्भव करती है। इस रास्ते लेखक ने जहाँ परिवेश का जीवन्त वर्णन किया है वहीं पात्रों के चरित्रों की सूक्ष्मतम रेखाएँ उभारकर उन्हें ऐसे आकार किया है कि उन्हें हम साक्षात् पाते हैं। लेखक ने उनके संवादों को ऐसे नियोजित किया है कि उनके चरित्र के साथ-साथ वर्णित घटनाएँ भी स्पष्ट होती जाती हैं।शिल्प के धरातल पर भी इस कृति में नयापन मिलता है। लेखक का प्रयोगशील रुझान नयी भाषा-शैली को रचने की ओर भी दिखाई देता है। इसलिए इसकी प्रौढ़ता देखकर सहसा यह विश्वास नहीं होता कि यह लेखक की प्रथम औपन्यासिक कोशिश है।भारतीय संस्कृति के उदात्त मानव-मूल्य और उदार जीवन-दृष्टि में रचे-बसे मानवीय सम्बन्धों की झलक देनेवाली इस कथा रचना में लेखक के समाजशास्त्रीय शोध-अध्ययन और तैयारी का भी पता चलता है।

डॉ. सूर्यपाल शुक्ल - दिसम्बर 1939 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) के एक गाँव–बिनयका में जन्मे डॉ. सूर्यपाल शुक्ल एक स्वनिर्मित व्यक्तित्व के धनी, प्रबुद्ध शिक्षक रहे हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा अति सामान्य परिस्थितियों में सम्भव हो सकी थी।स्वभाव से अन्तर्मुखी, मृदुभाषी एवं अध्यवसायी श्री शुक्ल ने अपना कार्यक्षेत्र चुना धुर उत्तरपूर्व स्थित अरुणाचल प्रदेश को। वहाँ के जनजीवन एवं प्राकृतिक सौन्दर्य ने उन्हें इस क़दर बाँधा कि वे वहाँ से कभी बाहर जाने को तैयार न हो सके, और गत 38 वर्षों से इसी प्रदेश में रमे रहे।उच्चशिक्षा के सभी आयामों-शिक्षण, प्रशासन, शोध, लेखन एवं ज्ञान के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपनी लगन, श्रम तथा प्रतिभा से, दक्षता का परिचय दिया। जियोमारफोलाजी तथा एप्लाएड जियोमारफोलाजी के क्षेत्र में उनके प्रामाणिक शोधग्रन्थों ने उन्हें देश एवं विशेषकर विदेशों में बड़ी ख्याति एवं मान प्रदान किया। उनका शोध क्षेत्र स्वाभाविक तौर पर पूर्वी हिमालय बना जिस पर उच्चकोटि के ग्रन्थों का सर्वथा अभाव था। इस दृष्टि से उनका योगदान और भी महत्त्वपूर्ण लगता है।चार कहानियों एवं कुछ निबन्धों के अलावा श्री शुक्ल जी ने हिन्दी में बहुत कुछ नहीं लिखा है। वस्तुतः यह उनकी, हिन्दी में, प्रथम रचना है। यह रचना भी उनके जीवन के एक विशेष कालखण्ड से सम्बन्धित है। तथ्यों को प्रस्तुत करने की उनकी अपनी अलग शैली है। अपनी धरती की भीनी-भीनी गन्ध से ओतप्रोत एक भाषा है।आशा है कि श्री शुक्ल का यह प्रथम प्रयास सुधी पाठकों को अपनी निष्पक्ष मति प्रकट करने को प्रेरित कर पायेगा।

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