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Tarpan

by Shivmurti
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788126708475
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 116
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Ed.
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): Ancient & Classical

‘तर्पण’ भारतीय समाज में सहस्राब्दियों से शोषित, दलित और उत्पीड़ित समुदाय के प्रतिरोध एवं परिवर्तन की कथा है। इसमें एक तरफ़ कई-कई हज़ार वर्षों के दुःख, अभाव और अत्याचार का सनातन यथार्थ है तो दूसरी तरफ़ दलितों के स्वप्न, संघर्ष और मुक्ति चेतना की नई वास्तविकता। इस नई वास्तविकता के मानदंड भी नए हैं, पैंतरे भी नए और अवक्षेपण भी नए। उत्कृष्ट रचनाशीलता के समस्त ज़रूरी उपकरणों से सम्पन्न ‘तर्पण’ दलित यथार्थ को अचूक दृष्टि-सम्पन्नता एवं सरोकार के साथ अभिव्यक्त करता है।

गाँव में ब्राह्मण युवक चन्दर दलित युवती रजपत्ती से बलात्कार की कोशिश करता है। रजपत्ती और साथ की अन्य स्त्रियों के विरोध के कारण वह सफल नहीं हो पाता। उसे भागना पड़ता है। लेकिन दलित बलात्कार किए जाने की रिपोर्ट लिखाते हैं। ‘झूठी रिपोर्ट’ के इस अर्द्धसत्य के ज़रिए शिवमूर्ति हिन्दू समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था के घोर विखंडन का महासत्य प्रकट करते हैं। इस पृष्ठभूमि पर इतनी बेधकता, दक्षता और ईमान के साथ अन्य कोई रचना दुर्लभ है।

समकालीन कथा साहित्य में शिवमूर्ति ग्रामीण वास्तविकता के सर्वाधिक समर्थ और विश्वसनीय लेखकों में हैं। ‘तर्पण’ उनकी क्षमताओं का शिखर है। रजपत्ती, भाईजी, मालकिन, धरमू पंडित जैसे अनेक चरित्रों के साथ अवध का एक गाँव अपनी पूरी सामाजिक, भौगोलिक संरचना के साथ यहाँ उपस्थित है। गाँव के लोग-बाग, प्रकृति, रीति-रिवाज, बोली-बानी—सब कुछ—शिवमूर्ति के जादू से जीवित-जाग्रत हो उठे हैं। युगों की रुद्ध शापित चेतना जब अपने प्रतिरोध और प्रतिशोध पर परवान चढ़ती है तो उसकी नज़र वर्तमान तक ही महदूद नहीं रहती, वह अतीत के सारे अभिशप्त पुरखों का तर्पण करती है और वैयक्तिकता सामूहिकता में ढलकर क्रान्ति का नया पाठ रचती है।

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