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Teesari Taali

by Pradeep Saurabh
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789350005026
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 195
  • Original Price: INR 495.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

यह उभयलिंगी सामाजिक दुनिया के बीच और बरक्स हिजड़ों, लौंडों, लौंडेबाजों, लेस्बियनों और विकृत प्रकृति की ऐसी दुनिया है जो हर शहर में मौजूद है और समाज के हाशिए पर जिन्दगी जीती रहती है। अलीगढ़ से लेकर आरा, बलिया, छपरा, देवरिया यानी 'एबीसीडी' तक, दिल्ली से लेकर पूरे भारत में फैली यह दुनिया समान्तर जीवन जीती है। प्रदीप सौरभ ने इस दुनिया के उस तहखाने में झाँका है, जिसका अस्तित्व सब 'मानते' तो हैं लेकिन 'जानते' नहीं। समकालीन 'बहुसांस्कृतिक' दौर के 'गे', 'लेस्बियन', 'ट्रांसजेंडर' अप्राकृत- यौनात्मक जीवन शैलियों के सीमित सांस्कृतिक स्वीकार में भी यह दुनिया अप्रिय, अकाम्य, अवांछित और वर्जित दुनिया है। यहाँ जितने चरित्र आते हैं वे सब नपुंसकत्व या परलिंगी या अप्राकृत यौन वाले ही परिवार परित्यक्त, समाज बहिष्कृत-दंडित ये 'जन' भी किसी तरह जीते हैं। असामान्य लिंगी होने के साथ ही समाज के हाशियों पर धकेल दिये गये, इनकी सबसे बड़ी समस्या आजीविका है जो इन्हें अन्ततः इनके समुदायों में ले जाती है। इनका वर्जित लिंगी होने का अकेलापन 'एक्स्ट्रा' है और वही इनकी जिन्दगी का निर्णायक तत्त्व है। अकेले-अकेले ये किन्नर आर्थिक रूप से भी हाशिये पर डाल दिये जाते हैं। कल्चरल तरीके से 'फिक्स' दिए जाते हैं। यह जीवनशैली की लिंगीयता है जिसमें स्त्री लिंगी-पुलिंगी मुख्यधाराएँ हैं जो इनको दबा देती हैं। नपुंसकलिंगी कहाँ कैसे जिएँगे? समाज का सहज स्वीकृत हिस्सा कब बनेंगे?फरटिदार पाठ देता 'मुन्नी मोबाइल' के बाद प्रदीप सौरभ का यह दूसरा उपन्यास 'तीसरी ताली' लेखक की जबर्दस्त पर्यवेक्षण-क्षमता का सबूत है। यहाँ वर्जित समाज की फुर्तीली कहानी है, जिसमें इस दुनिया का शब्दकोश जीवित हो उठा है। लेखक की गहरी हमदर्दी इस जिन्दगी के अयाचित दुखों और अकेलेपन की तरफ है। इस दुनिया को पढ़कर ही समझा जा सकता है कि इस दुनिया को बाकी समाज, जिस निर्मम क्रूरता से 'डील' करता है वही क्रूरता इनमें हर स्तर पर 'इनवर्ट' होती रहती है। उनकी जिन्दगी का हर पाठ आत्मदंड, आत्मक्रूरता, चिर यातना का पाठ है। यह हिन्दी का एक साहसी उपन्यास है जो जेंडर के इस अकेलेपन और जेंडर के अलगाव के बावजूद समाज में सम्मान से जीने की ललक से भरपूर दुनिया का परिचय कराता है।—सुधीश पचौरी

प्रदीप सौरभनिजी जीवन में खरी-खोटी हर खूबियों से लैस। खड़क, खुर्राट और खरे। मौन में तर्कों का पहाड़ लिये इस शख्स ने कब, कहां और कितना जिया इसका हिसाब-किताब कभी नहीं रखा। बँधी-बँधाई लीक पर नहीं चले। पेशानी पर कभी कोई लकीर नहीं, भले ही जीवन की नाव 'भँवर' पर अटकी खड़ी हो। कानपुर में जन्मे लेकिन लम्बा समय इलाहाबाद में गुजरा। वहीं विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। जनआन्दोलनों में हिस्सा लिया। कई बार जेल गये। कई नौकरियाँ करते-छोड़ते दिल्ली पहुँच कर 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के सम्पादकीय विभाग से जुड़े। कलम से तनिक भी ऊबे तो कैमरे की आँख से बहुत कुछ देखा। कई बड़े शहरों में फोटो प्रदर्शनी लगाई। मूड आया तो चित्रांकन भी किया। पत्रकारिता में पच्चीस वर्षों से अधिक का समय पूर्वोत्तर सहित देश के कई राज्यों में गुजारा। गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत हुए। देश का पहला हिन्दी का बच्चों का अखबार और साहित्यिक पत्रिका मुक्ति का संपादन किया। पंजाब के आतंकवादियों और बिहार के बँधुआ मजदूरों पर बनी लघु फिल्मों के लिए शोध। बसेरा टीवी धारावाहिक के मीडिया सलाहकार भी रहे। कई विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभाग की विजिटिंग फैकल्टी हैं। इनके हिस्से कविता, बच्चों की कहानी, सम्पादित आलोचना की पाँच किताबें हैं। ‘मुन्नी मोबाइल' के बाद 'तीसरी ताली' इनका दूसरा उपन्यास है।

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